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टीएमसी में जोरदार बगावत और टूट के बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने अभिषेक बनर्जी को दी तारीख नए गुट की मान्यता पर…



TMC Split Row: पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर मचे घमासान के बीच देश की राजधानी दिल्ली से एक बड़ी राजनीतिक खबर सामने आ रही है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला आगामी 19 जून को तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक बनर्जी से मुलाकात करेंगे। 

संसदीय सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस बैठक का मुख्य उद्देश्य ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी में हुए हालिया संसदीय बंटवारे और बागी सांसदों के दावों पर आधिकारिक पक्ष जानना है। 

तृणमूल कांग्रेस के सूत्रों ने पुष्टि की है कि पार्टी को बुधवार शाम करीब 5 बजे लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय से इस बैठक के संबंध में एक आधिकारिक ईमेल प्राप्त हुआ है, जिसके बाद अब शुक्रवार शाम को यह महत्वपूर्ण मुलाकात होने जा रही है। 

20 से अधिक बागी सांसदों के दावे से गहराया संकट

बता दें, यह पूरा घटनाक्रम संसद में तृणमूल कांग्रेस के सांसदों के बीच पैदा हुई एक बड़ी बगावत के बाद शुरू हुआ है। दरअसल, TMC के करीब 20 बागी सांसदों ने ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ में खुद के विलय का दावा किया है और इसके बाद लोकसभा में खुद को एक अलग विधायी समूह के रूप में मान्यता देने की मांग की है।

इतना ही नहीं, बागी खेमे की सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने एक बड़ा दावा करते हुए कहा है कि लोकसभा में टीएमसी के कुल 28 सांसदों में से 22 सांसदों का समर्थन अब उनके विद्रोही गुट के पास है। खुद को ‘असली TMC’ बताने वाले इन बागी सांसदों ने दिल्ली में BJP के शीर्ष नेताओं से भी मुलाकात की है। 

इससे ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले आधिकारिक धड़े की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए स्पीकर ओम बिरला ने किसी भी अंतिम फैसले पर पहुंचने से पहले दोनों ही पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुनने का निर्णय लिया है। 

दलबदल विरोधी कानून का हवाला

इस राजनीतिक संकट की सुगबुगाहट भांपते हुए अभिषेक बनर्जी ने पहले ही 10 जून को लोकसभा अध्यक्ष को एक पत्र भेजा था। इस पत्र की हार्ड कॉपी पार्टी सांसद कीर्ति आजाद और सागरिका घोष ने रविवार को स्पीकर के आवास पर जाकर सौंपी थी। अपने पत्र में अभिषेक बनर्जी ने स्पीकर से पुरजोर आग्रह किया है कि वे ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ (AITC) से अलग होने का दावा करने वाले किसी भी नए समूह या गुट को संसद में कोई मान्यता, दर्जा या विशेष सुविधा प्रदान न करें। 

उन्होंने देश के संविधान और दलबदल विरोधी कानून का हवाला देते हुए तर्क दिया कि वर्तमान कानूनी ढांचे के तहत किसी भी राजनीतिक पार्टी के भीतर किसी नए विरोधी गुट या समानांतर समूह को मान्यता देने का कोई प्रावधान ही नहीं है। 

अभिषेक बनर्जी ने दी सुप्रीम कोर्ट के फैसले की दलील

अभिषेक बनर्जी ने अपने कानूनी पक्ष को मजबूत करने के लिए महाराष्ट्र के हालिया राजनीतिक संकट पर आए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले का भी जिक्र किया है। उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अब राजनीतिक दलों में “बंटवारे” को कानूनी ढाल के रूप में इस्तेमाल करने की छूट खत्म हो चुकी है। 

कानून केवल मूल राजनीतिक पार्टी को ही मान्यता देता है, न कि उसके भीतर पनपे किसी बागी गुट को। इसके साथ ही उन्होंने दलील दी कि किसी भी तरह के विलय को वैध मानने के लिए मूल राजनीतिक दल का पूरी तरह विलय होना और साथ ही दो-तिहाई विधायकों या सांसदों का समर्थन मिलना, दोनों शर्तें एक साथ पूरी होना अनिवार्य है। केवल किसी एक शर्त के आधार पर पार्टी से अलग होने का दावा नहीं किया जा सकता।

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