इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में आयुष्मान भारत योजना में घोटाला सामने आया है। आरोप है कि जरूरतमंद मरीजों को मुफ्त इलाज के बजाय उनसे नगद राशि वसूली गई। फिर सरकारी क्लेम में हेराफेरी कर करीब 45 लाख रुपए का गबन किया गया।
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प्रारंभिक जांच से संकेत मिले हैं कि यह अनियमितता पिछले साढ़े 3 वर्षों से जारी थी। स्वास्थ्य विभाग ने अब आयुष्मान योजना के तहत इलाज कराने वाले सभी मरीजों के रिकॉर्ड की ऑडिट कराने का निर्णय लिया है।
इस मामले की जांच के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से गठित 6 सदस्यीय टीम बुधवार को IGIMS पहुंची। प्रशासनिक भवन में लगभग 2 घंटे तक बंद कमरे में बैठक हुई। स्वास्थ्य विभाग के प्रतिनिधि डॉ. बिंदे कुमार ने बैठक की निगरानी की। इस दौरान संस्थान प्रशासन, तकनीकी विभाग और आयुष्मान योजना से जुड़े कई कर्मचारियों से पूछताछ की गई।

आईजीआईएमएस में पहुंचे मरीज।
मरीजों का डेटा मांगा गया है
विभागीय अधिकारियों ने बताया कि जांच केवल आउटसोर्सिंग कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगी। संस्थान के स्थायी कर्मचारियों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जाएगी। जांच टीम ने अस्पताल प्रशासन से पिछले साढ़े तीन वर्षों में आयुष्मान योजना के तहत भर्ती मरीजों का पूरा डेटा मांगा है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि पात्र मरीजों को किन परिस्थितियों में कैश मरीज दिखाया गया और उनसे रकम वसूली गई।
बैठक से पहले आयुष्मान कार्यालय में छानबीन जांच टीम ने बैठक शुरू होने से पहले मुख्य ओपीडी भवन स्थित आयुष्मान भारत योजना के कार्यालय कक्ष संख्या-22 का निरीक्षण किया। यहां तकनीकी विभाग के अधिकारियों और योजना से जुड़े सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को भी बुलाया गया।
टीम ने आउटसोर्सिंग एजेंसी “मेहता डाटा मैट्रिक्स” से जुड़े कर्मचारियों के कंप्यूटर सिस्टम, लॉगिन डिटेल और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच की। अधिकारियों ने कई महत्वपूर्ण और सुरक्षित डेटा को जब्त कर तकनीकी विश्लेषण के लिए अपने साथ ले लिया। आशंका जताई जा रही है कि मरीजों की श्रेणी बदलने और भुगतान संबंधी एंट्री में तकनीकी स्तर पर छेड़छाड़ की गई।
जांच से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि जरूरत पड़ने पर साइबर विशेषज्ञों और वित्तीय जांच एजेंसियों की भी मदद ली जाएगी, ताकि यह पता लगाया जा सके कि सरकारी राशि किस स्तर पर और किन खातों के माध्यम से प्रभावित हुई।

शास्त्रीनगर थाने में प्राथमिकी दर्ज है IGIMS प्रशासन की शिकायत के अनुसार आयुष्मान भारत योजना के पात्र मरीजों को सिस्टम में कैश बेसिस मरीज दिखाया जाता था। इसके बाद उनसे इलाज के नाम पर नकद राशि ली जाती थी। वहीं दूसरी ओर सरकारी क्लेम प्रक्रिया में भी हेराफेरी की जाती थी। मामले का खुलासा होने के बाद संस्थान के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी प्रफुल्ल रंजन की शिकायत पर शास्त्रीनगर थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई। प्राथमिकी में आउटसोर्सिंग एजेंसी मेहता डाटा मैट्रिक्स कंपनी के अमरजीत राज, चंदन कुमार, साकेत कुमार और अभिषेक कुमार को नामजद आरोपी बनाया गया है।
इसके अलावा कई अज्ञात लोगों को भी आरोपी बनाया गया है। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग दोनों स्तर पर जांच जारी है। अधिकारियों का मानना है कि मामले की परतें खुलने पर इसमें और लोगों की संलिप्तता सामने आ सकती है और संभावना हैं पूरे ऑडिट के बाद गबन की राशि और बढ़ सकती है। हर मरीज के इलाज और भुगतान की होगी ऑडिट जांच टीम ने तय किया है कि पिछले साढ़े तीन वर्षों में आयुष्मान भारत योजना के तहत भर्ती हुए सभी मरीजों के इलाज, कार्ड सत्यापन, भुगतान और कैश एंट्री की जांच की जाएगी। इसके लिए डिजिटल रिकॉर्ड के साथ-साथ अस्पताल के मैनुअल दस्तावेज भी खंगाले जाएंगे। टीम यह भी पता लगाएगी कि कितने मरीजों से नकद राशि ली गई और क्या उन्हें इसकी रसीद दी गई थी। कई मरीजों और उनके परिजनों से भी संपर्क कर बयान दर्ज करने की तैयारी है। गरीब मरीजों में नाराजगी, स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल आयुष्मान भारत योजना आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। ऐसे में सरकारी अस्पताल में ही गरीब मरीजों से नकद वसूली के आरोप सामने आने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि अगर आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद सरकारी अस्पतालों में पैसे देने पड़ेंगे तो गरीब मरीज आखिर कहां जाएंगे। कई लोगों ने इस मामले में सख्त कार्रवाई की मांग की है।