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मोतिहारी के चैलाहा में कुम्हार परिवार दीपावली और छठ के लिए मिट्टी के दीये, कलश, हाथी, ढकना और पूजन सामग्री बना रहे हैं। यहां दो दर्जन से ज्यादा परिवार इस काम में लगे हैं। त्योहार उनके लिए कमाई का मौका होते हैं। इन दिनों कुम्हारों के घरों में चाक लगातार घूम रहे हैं। कोई मिट्टी तैयार कर रहा है, तो कोई दीये और बर्तनों को आकार दे रहा है। महिलाएं भी इस काम में पुरुषों का हाथ बंटा रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक चाक से कुम्हारों का काम हुआ आसान पहले बर्तन लकड़ी के चाक पर बनाए जाते थे। अब इलेक्ट्रॉनिक चाक से घंटों का काम मिनटों में हो जाता है। इससे उत्पादन बढ़ा है और मेहनत कुछ कम हुई है, लेकिन आमदनी नहीं बढ़ी। कुम्हार जनमत पंडित ने बताया कि मिट्टी लाने, बर्तन बनाने और उन्हें बाजार तक पहुंचाने का खर्च बढ़ गया है। इसके बावजूद मिट्टी के बर्तनों की कीमत उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। नई पीढ़ी पुश्तैनी काम से बना रही दूरी उन्होंने कहा कि इस काम से किसी तरह परिवार का गुजारा हो पाता है। दाल-रोटी का खर्च निकल जाए, यही बहुत है। कम कमाई के कारण नई पीढ़ी इस पुश्तैनी काम से दूरी बना रही है और दूसरे रोजगार तलाश रही है। यही कारण है कि परिवार के बच्चे अब इस पुश्तैनी काम से दूरी बना रहे हैं। दीपावली-छठ पर दीये की बढ़ जाती है डिमांड
उनकी पत्नी राजवती देवी कहती हैं कि पूरा परिवार मिलकर मिट्टी के बर्तन बनाता है। सालभर दीपावली और छठ का इंतजार रहता है, क्योंकि इन त्योहारों में मिट्टी के दीये और अन्य पूजन सामग्री की मांग बढ़ जाती है। इसके बावजूद उचित कीमत नहीं मिलने से परेशानी बनी रहती है। मेहनत के अनुसार आमदनी नहीं होने के कारण नई पीढ़ी अब इस काम को छोड़कर दूसरे धंधों की ओर जा रही है। कुम्हार परिवारों की चिंता सिर्फ कम आमदनी तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें अपनी पुश्तैनी कला के खत्म होने का भी डर सता रहा है। जिस चाक पर पीढ़ियों से मिट्टी को आकार देकर घर-आंगन रोशन किया जाता रहा है। आने वाले समय में उस चाक को चलाने वाले हाथ ही कम होते जा रहे हैं।
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