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सुवेंदु सरकार को से मिली बड़ी राहत कोर्ट ने बोवबाजर बम ब्लास्ट के दोषी रशीद खान को समय से पहले रिहा करने के…



सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें 1993 के बोबाजार बम धमाके मामले के दोषियों में एक मोहम्मद राशिद खान को समय से पहले रिहा करने का निर्देश दिया गया था। इस धमाके में 69 लोगों की मौत हुई थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सुवेंदु सरकार को बड़ी राहत मिली है। राज्य सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।

पश्चिम बंगाल सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल कर दिल्ली हाईकोर्ट के 5 जून के आदेश को चुनौती दी थी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत के समक्ष मामले का उल्लेख करते हुए राज्य सरकार ने जल्द सुनवाई की भी मांग की थी। राज्य सरकार की दलील सुनने के बाद CJI सूर्यकांत ने आश्वासन दिया था कि याचिका पर शीघ्र सुनवाई की जाएगी, जिसके बाद आज, 23 जून को मामले की सुनवाई हुई।

रशीद खान की रिहाई के आदेश पर रोक

जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने पश्चिम बंगाल सरकार की याचिका पर यह अंतरिम आदेश दिया, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने खान को जवाब देने के लिए नोटिस भी जारी किया है और समय से पहले रिहा करने के निर्देश पर रोक लगा दी।

कैसे हुआ था बोबाजार में बम धमाका

बता दें कि 1993 में कोलकाता में हुए धमाकों में कम से कम 69 लोग मारे गए थे। ये धमाके भारी मात्रा में रखे गए उन विस्फोटकों के कारण हुए थे जिन्हें खान ने 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद सांप्रदायिक हमले के डर से अपने बोबाजार स्थित घर में जमा किया था। खान को 2001 में TADA कोर्ट ने इस मामले में दोषी ठहराया था। बाद में कलकत्ता हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने उसकी सजा को बरकरार रखा था।

दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया था ये आदेश

पश्चिम बंगाल सरकार ने 2015 में उसकी रिहाई पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी। हालांकि, उसकी रिहाई रुकी रही क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के कारण राज्य सरकार केंद्रीय कानूनों के तहत समय से पहले रिहाई की अपनी शक्ति का इस्तेमाल नहीं कर पा रही थी। दिल्ली हाई कोर्ट के एक जज ने 5 जून को फैसला सुनाया कि चूंकि खान पैरोल की अवधि सहित 33 साल से ज्यादा समय जेल में बिता चुका है, इसलिए वह रिहाई का हकदार है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि अपराध की गंभीरता को अकेले रिहाई से इनकार का आधार नहीं बनाया जा सकता, यदि दोषी अन्य सभी मानदंडों (जैसे अच्छा आचरण, जेल में बिताया लंबा समय और अपराध दोहराने की कम संभावना) को पूरा करता हो।



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