
Samrat Choudhary: हालही में NDA की ओर से बिहार की सत्ता की कमान संभालने वाले सम्राट चौधरी न केवल अपने ‘मुरैठा’ (पगड़ी) और तीखे बयानों के लिए जाने जाते हैं, बल्कि उनकी शैक्षणिक योग्यता भी अक्सर राजनीतिक गलियारों में चर्चा और विवाद का विषय रही है। डिप्टी सीएम से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने वाले सम्राट चौधरी की डिग्री पर पूर्व में नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव जैसे दिग्गज नेता सवाल उठा चुके हैं। आइए जानते हैं कि कागजों में बिहार के नए मुख्यमंत्री कितने पढ़े-लिखे हैं।
चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामों के अनुसार, सम्राट चौधरी ने अपनी उच्च शिक्षा तमिलनाडु की प्रसिद्ध मदुरै कामराज यूनिवर्सिटी से पूरी की है। हालांकि, सबसे ज्यादा विवाद उनकी ‘डॉक्टर’ की उपाधि को लेकर हुआ। उनके एक हलफनामे में ‘कैलिफोर्निया पब्लिक यूनिवर्सिटी’ से मिली D.Litt (डॉक्टर ऑफ लेटर्स) की मानद उपाधि का जिक्र है।
इसी डिग्री के आधार पर उनके समर्थक उन्हें ‘डॉक्टर सम्राट चौधरी’ कहकर बुलाते हैं, जबकि विपक्ष इसे अक्सर फर्जी या गैर-मान्यता प्राप्त बताकर हमला करता रहा है।
तेजस्वी और नीतीश कुमार के तीखे सवाल
बता दें, सम्राट चौधरी की शिक्षा को लेकर बिहार की राजनीति में कई बार जुबानी जंग छिड़ चुकी है। पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने एक बार उन पर तंज कसते हुए दावा किया था कि सम्राट चौधरी मैट्रिक फेल हैं और उनकी डॉक्टरेट की डिग्री केवल कागजों तक सीमित है।
वहीं, दिलचस्प बात यह है कि कभी नीतीश कुमार ने भी उनकी डिग्री की सत्यता पर सवाल उठाए थे। इसके अलावा चुनावी रणनीतिकार से नेता बने जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर भी उनकी शिक्षा को लेकर घेराबंदी कर चुके हैं। इन सभी का मुख्य तर्क यह रहा है कि जिस यूनिवर्सिटी से उन्होंने डिग्री ली है, उसकी साख और आधिकारिक पहचान खुद संदिग्ध है।
राकेश कुमार से बने ‘सम्राट चौधरी’
बता दें, सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर केवल किताबी ज्ञान पर निर्भर नहीं रहा है। उनके आधिकारिक दस्तावेजों में पहले उनका नाम ‘राकेश कुमार’ दर्ज था, जिसे बाद में उन्होंने बदलकर सम्राट चौधरी कर लिया। उन्हें राजनीति का ककहरा अपने पिता और दिग्गज नेता शकुनी चौधरी से विरासत में मिला।
वहीं, सम्राट चौधरी के करियर के साथ विवादों का पुराना नाता रहा है; 1999 में जब वे राबड़ी देवी सरकार में पहली बार मंत्री बने, तब उनकी उम्र को लेकर बड़ा बवाल हुआ था। आरोप लगा था कि वह मंत्री बनने के लिए निर्धारित 25 वर्ष की न्यूनतम आयु सीमा भी पूरी नहीं करते थे। इन तमाम विवादों के बावजूद, आज वे बिहार भाजपा के सबसे कद्दावर नेता बनकर उभरे हैं।