सम्राट सरकार के शिक्षा मंत्री और फायर ब्रांड नेता मिथिलेश तिवारी कुर्सी संभालते ही विवादों में घिर गए हैं। 11 साल पहले उनके ऊपर दर्ज भ्रष्टाचार की फाइल खुल गई है। मंत्री पर धोखाधड़ी, सरकारी पैसे हड़पने और घोटाला जैसे गंभीर आरोप लगे हैं।
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मिथिलेश तिवारी के खिलाफ मुजफ्फरपुर के निगरानी कोर्ट में केस चल रहा है। दोषी पाए जाने पर उन्हें उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। मामले की अगली सुनवाई 14 जुलाई को होने वाली है।
भास्कर की स्पेशल रिपोर्ट में जानिए, शिक्षा मंत्री पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप का A टू Z.
मिथिलेश तिवारी पर है क्या आरोप?
मिथिलेश तिवारी के मंत्री बनने के बाद बिहार विद्यालय परीक्षा समिति का पत्र सामने आया है। सचिव के साइन से जारी पत्र 20 मार्च 2017 को लिखा गया है।
इसमें बताया गया है कि मिथिलेश तिवारी पंडित दीन दयाल उपाध्याय इंटर महाविद्यालय खजुरिया, बरौली, गोपालगंज के तत्कालीन अध्यक्ष हैं। समिति के सचिव ने मिथिलेश तिवारी पर मुकदमा चलाने की अनुमति दी है।
मिथिलेश तिवारी पर लगे आरोप इसी कॉलेज से जुड़ा है। वह कॉलेज के प्रबंधन समिति के अध्यक्ष थे। आरोप है कि इन्होंने सरकार से मिले 50 लाख रुपए की हेराफेरी की। पैसा कॉलेज के कर्मियों के वेतन के लिए था। आरोप है कि मिथिलेश ने फर्जी दस्तावेज लगाकर पैसे खुद हड़प लिए।
मिथिलेश तिवारी ने चुनावी हलफनामे में भी निगरानी केस की जानकारी सार्वजनिक की है। चुनावी हलफनामे के मुताबिक, विजिलेंस पुलिस थाने में 34/2015 केस पेंडिंग है। स्पेशल जज विजिलेंस कोर्ट मुजफ्फरपुर में केस की सुनवाई चल रही है। मिथिलेश पर फर्जी दस्तावेज देने और बेईमानी करने के अलावा प्रिवेंशन ऑफ करप्शन की धाराएं लगी हैं।

मिथिलेश तिवारी से जुड़ा बिहार विद्यालय परीक्षा समिति का यह पत्र सामने आया है।
मिथिलेश तिवारी पर 420 की धारा
मिथिलेश तिवारी के खिलाफ 7 मई 2015 को निगरानी एसपी ने एफआईआर दर्ज कराई थी। FIR No 034/2015 है। मंत्री के खिलाफ लगी धाराएं..
- निगरानी दंड प्रक्रिया 1973 (1974 का अधिनियम-49) की धारा 197
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988(1988 का अधिनियम-49) की धारा-19
- आईपीसी (1860 का अधिनियम संख्या-45) की धारा 188 व 174
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(2) rw 13, (1)(d)
- IPC की धारा 409 (420), 467/477(A) और 120(B)
- PC ACT, 1988 की धारा 7/13(2), 13(1)(D)
कोर्ट में केस की स्थिति जानिए
- मुजफ्फरपुर निगरानी कोर्ट में सुनवाई चलाई जा रही है। कोर्ट में स्टेट गवर्मेंट वर्सेज मिथिलेश तिवारी मुकदमा दर्ज है। रजिस्ट्रेशन नंबर-10014 है।
- मुजफ्फरपुर कोर्ट की मानें तो पेटिसनर और एडवोकेट-स्टेट ऑफ बिहार, वकील स्पेशल पीपी
- रेसपॉडेंट-मिथिलेश तिवारी हैं। कोर्ट में केस 7 मई 2015 को फाइल किया गया था। पहली सुनवाई 18 अप्रैल 2020 को हुई। अगली सुनवाई की तारीख 14 जुलाई 2026 को है। केस गवाही के दौर से गुजर रहा है।
- मुकदमा दर्ज हुए 11 साल हो गए। अब तक 11 तारीख पर सुनवाई हुई है। निगरानी कोर्ट में चार्जशीट-7 मई 2025 को दाखिल की गई थी।

अब तिवारी पर लगी धाराओं को आसान भाषा में समझते हैं
PC ACT की 13(2) और 13, (1)(d): भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(2) और धारा 13(1)(घ) तब लगाई जाती है जब लोक सेवक (सरकारी कर्मी) अपने पद का दुरुपयोग कर अनुचित लाभ यानी घोटाला करता है।
ऐसे क्राइम के लिए 1-7 साल का जेल हो सकता है। साल 2018 के संशोधन में धारा 13(1)(घ) के जगह पर “आपराधिक कदाचार” की नई परिभाषाएं लागू की गईं, जो अवैध तरीके से धन अर्जन किया जाना है।
IPC की 409(420), 467/477(A) और 120(B): ये धाराएं आमतौर पर बैंक धोखाधड़ी, सरकारी पैसे के घोटाले और वित्तीय हेरफेर के मामलों में एक साथ लगाई जाती हैं। इसका सीधा मतलब है कि आरोपियों ने मिलकर लूट यानी घोटाला की योजना बनाई। सरकारी या सार्वजनिक धन का गबन किया है। उन पैसे और को छिपाने के लिए फर्जी दस्तावेज और खाते तैयार किए हैं।
- 120B: जब दो या दो से अधिक लोग मिलकर किसी अपराध को अंजाम देने की साजिश बनाते हैं तो यह धारा लगती है। इसमें शामिल हर व्यक्ति अपराध के लिए बराबर का भागीदार माना जाता है।
- 409: जब कोई सरकारी कर्मचारी, बैंक अधिकारी या कोई एजेंट अपने पास भरोसे से रखी गई सरकारी या सार्वजनिक संपत्ति का खुद के फायदे के लिए गबन करता है तो यह धारा लगाई जाती है।
- 420: धोखाधड़ी के मामले में यह धारा लगाई जाती है। जब कोई व्यक्ति किसी को धोखा देकर या झूठ बोलकर उसकी संपत्ति, पैसे या कोई कीमती समान अपने नाम करवा लेता है या उसे देने के लिए मजबूर करता है।
- 467: बैंक ड्राफ्ट, चेक, वसीयत, या किसी की कीमती जमीन-जायदाद के कागजात जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेजों का फर्जीवाड़ा या नकली सिंग्नेचर से अपने लिए इस्तेमाल करने पर यह धारा लगती है। इसमें उम्रकैद तक का प्रावधान है।
- 468: किसी व्यक्ति या विभाग को धोखा देने के इरादे से कोई भी फर्जी दस्तावेज, फर्जी आईडी या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड तैयार करने पर यह धारा लगती है।
- 471: यह धारा तब लगती है जब कोई व्यक्ति यह जानते हुए भी कि दस्तावेज फर्जी या नकली हैं, उन्हें किसी सरकारी विभाग या बैंक के सामने असली बताकर इस्तेमाल करता है।
- 477A: यदि कोई क्लर्क, अधिकारी या कर्मचारी कंपनी और सरकार के बही-खातों, डायरियों या डिजिटल अकाउंट्स में जानबूझकर चेंज करता है। उन्हें मिटाता या झूठी एंट्री करता है ताकि वित्तीय हेराफेरी को छुपाया जा सके तो यह धारा लगती है।

शिक्षा मंत्री बनने के बाद मिथिलेश तिवारी ने वाराणसी स्थित बाबा काल भैरव मंदिर जाकर नजर उतरवायी थी।
मंत्री बोले-राजनीतिक साजिश के तहत आरोप लगे
इस मामले में मिथिलेश तिवारी का पक्ष जानने के लिए हमने उनसे फोन पर बात की। उन्होंने कहा, ‘यह काफी पुराना मामला है। मेरे स्थानीय विरोधी ने राजनीतिक साजिश के तहत आरोप लगाया था। मामले को लेकर मैं पटना हाईकोर्ट गया था। हाईकोर्ट ने सारी सुनवाई पर रोक लगा दी थी। सरकार से पक्ष मांगा गया था, लेकिन सरकार की तरफ से कोई जानकारी नहीं दी गई।’
हमने (भास्कर ने) जब मुजफ्फरपुर के निगरानी कोर्ट में चल रही सुनवाई को लेकर कहा तो मंत्री ने जवाब दिया, ‘मेरे वकील मेरा पक्ष रख रहे हैं।’

मिथिलेश तिवारी ने 8 मई को बिहार सरकार के शिक्षा मंत्री के तौर पर पदभार संभाला था।
क्या सीएम सम्राट नीतीश कुमार के फैसले को दोहराएंगे
बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री डॉ. मेवालाल चौधरी ने 19 नवंबर 2020 को पदभार ग्रहण करने के मात्र दो घंटे के भीतर इस्तीफा दे दिया था। वह पूर्व सीएम नीतीश कुमार की कैबिनेट में शामिल हुए थे। उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे।
मेवालाल 2017 में भागलपुर के सबौर कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति थे। इस पद पर रहते हुए उन्होंने 161 सहायक प्रोफेसरों और जूनियर वैज्ञानिकों की भर्ती की थी। इस भर्ती में धांधली और भ्रष्टाचार करने के गंभीर आरोप लगे थे।
यह असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती घोटाला के नाम से जाना जाता है। मेवालाल चौधरी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। शिक्षा मंत्री बनने से पहले जेडीयू ने 2017 में उन्हें पार्टी से निलंबित भी किया था। बाद में अग्रिम जमानत मिल गई थी। इसके बाद वह चुनाव लड़े थे। विपक्ष ने मेवालाल पर लगे आरोपों को मुद्दा बनाया। तेजस्वी यादव ने सरकार को घेरा।
ऐसे में नीतीश कुमार ने 19 नवंबर 2020 की दोपहर को मेवालाल चौधरी को तलब किया। इसके बाद मेवालाल ने अपना इस्तीफा राजभवन को भेज दिया था। अप्रैल 2021 में कोरोना संक्रमण के कारण डॉ. मेवालाल चौधरी का निधन हो गया।