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नालंदा के मोरा तालाब में सोमवार की शाम पूर्व सांसद आनंद मोहन का भव्य अभिनंदन किया गया। इस दौरान उन्होंने आक्रमक अंदाज में बिहार के वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम, नीतीश कुमार के सीएम पद छोड़ने, सत्ता में बैठे कुछ खास लोगों और ‘एनकाउंटर संस्कृति’ पर अपनी बात रखी। साफ तौर पर कहा कि वे किसी ‘पुत्र या पत्नी मोह’ में नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र को बचाने और वाजिब सवालों को उठाने के लिए निकले हैं। ‘नीतीश बड़े भाई हैं, मैं उनका चमचा नहीं’ नीतीश कुमार के साथ अपने संबंधों पर सफाई देते हुए आनंद मोहन ने कहा, ‘नीतीश कुमार मेरे नेता नहीं, बल्कि बड़े भाई हैं। हम दोनों का जन्म जेपी आंदोलन (1974 की क्रांति) से हुआ है। मैं उनका चमचा नहीं हूं। मैं उनका भाई हूं और भाई को भाई से ज्यादा मोहब्बत होती है।’ सत्ता परिवर्तन पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि जब एनडीए ने ‘2025 से 30, फिर से नीतीश’ का नारा दिया था और सरकार सुचारू रूप से चल रही थी, तो ऐसी कौन सी आफत आ गई कि रातों-रात उन्हें अपदस्थ कर दिया गया। यह जनादेश और लोकतंत्र का मजाक है, जिसके कारण पूरा देश और बिहार की जनता हैरान है। ‘चंडाल चौकड़ी’ पर 1000 करोड़ के साम्राज्य का आरोप पूर्व सांसद ने बिना नाम लिए सत्ता के शीर्ष पर बैठे कुछ लोगों (चंडाल चौकड़ी) पर गहरी साजिश का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जिन कार्यकर्ताओं की जिंदगी पार्टी का झंडा ढोने और लाठियां खाने में बीत जाती है, उन्हें कुछ नहीं मिलता। वहीं, पर्दे के पीछे खेल करने वालों ने सत्ता का दुरुपयोग कर बिहार, दिल्ली, मुंबई से लेकर सिंगापुर और दुबई तक हजारों करोड़ का आर्थिक साम्राज्य खड़ा कर लिया है। मगध के इतिहास का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यहां ‘राजा बृहद्रथ और पुष्यमित्र शुंग’ वाली कहानी फिर से दोहराई गई है। ‘राजपूत गद्दार नहीं, बागी होता है’ खुद पर लग रहे ‘पुत्र और पत्नी मोह’ के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि अगर उन्हें मोह होता तो वे आराम करते, क्योंकि घर में सांसद (पत्नी) और विधायक (बेटा) दोनों मौजूद हैं। सरकार में विभागों के बंटवारे पर भी गहरी नाराजगी जताई। उन्होंने सवाल किया, ‘हमारे लिए सिर्फ चापाकल गाड़ने-उखाड़ने (PHED), खेल-कला, आपूर्ति और सहकारिता जैसे विभाग ही क्यों रिजर्व हैं?’ सवर्णों की राजनीतिक हिस्सेदारी पर हुंकार भरते हुए आनंद मोहन ने स्पष्ट किया, राजपूत गद्दार नहीं होता, लेकिन बागी जरूर होता है। हम समाज के हर वर्ग को सुरक्षा देते हैं और जुल्म को जातियों में नहीं बांटते। भरत तिवारी एनकाउंटर: ‘फैसला कोर्ट करेगा, पुलिस नहीं’ भरत तिवारी एनकाउंटर पर पूछे गए सवाल पर आनंद मोहन ने मीडिया और सिस्टम दोनों को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि मीडिया पहले किसी को पुलिस को विवश करने वाला अपराधी बताता है और एनकाउंटर के बाद उसे ‘भगत सिंह’ बना देता है। पूर्व सांसद ने स्पष्ट किया कि वे न तो यूपी की ‘बुलडोजर संस्कृति’ के समर्थक हैं और न ही ‘एनकाउंटर संस्कृति’ के। लोकतंत्र में किसी भी पुलिस अधिकारी को यह हक नहीं है कि किसी के आत्मसमर्पण करने के बाद उसका एनकाउंटर किया जाए। अगर कोई न्यायिक हिरासत में आता है, तो उसकी सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। पुलिस का काम अपराधी को पकड़कर कोर्ट में पेश करना है। सजा तय करने का काम कोर्ट का है। अगर पुलिस ही एनकाउंटर करने लगेगी, तो फिर कोर्ट की क्या जरूरत है?
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