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बिहार के सुपौल जिले की मिट्टी से निकलकर रंगमंच, बॉलीवुड और अब मराठी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बना रहे अभिनेता कुमार आर्यन इन दिनों चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। देसी अंदाज, गजब का आत्मविश्वास और संघर्ष से भरी उनकी कहानी युवाओं के लिए प्रेरणा बनती जा रही है। हाल ही में जब कुमार आर्यन देश के राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन के लोकप्रिय शो “फिल्मी कीड़ा” में बतौर अभिनेता चीफ गेस्ट के रूप में नजर आए, तो उन्होंने अपने सादगी भरे व्यक्तित्व और दमदार बातचीत से सभी का दिल जीत लिया। गर्दन में गमछा, वुडलैंड जैकेट और सहज व्यवहार ने यह साबित कर दिया कि सफलता के बाद भी उन्होंने अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा है। राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ चुके
कुमार आर्यन की खास बात यह है कि वे अपने हर सफर की शुरुआत “जय मां काली, हर-हर महादेव” के उद्घोष के साथ करते हैं। यही धार्मिक आस्था और संस्कार उन्हें भीड़ से अलग पहचान दिलाते हैं। अगर बिहार से जुड़े कलाकारों की बात करें तो मनोज बाजपेयी, पंकज त्रिपाठी और संजय मिश्रा जैसे दिग्गज पहले ही राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ चुके हैं। अब इसी कड़ी में कुमार आर्यन का नाम भी तेजी से जुड़ता जा रहा है। खास बात यह है कि उन्हें सुपौल जिले का पहला बॉलीवुड अभिनेता माना जा रहा है। सुपौल जिले ने इससे पहले संगीत जगत में उदित नारायण और लोकगायिका शारदा सिन्हा जैसे बड़े कलाकार दिए हैं। अब अभिनय के क्षेत्र में कुमार आर्यन ने इस सूची को आगे बढ़ाया है। लोग अपनी पहचान बनाने की लड़ाई लड़ रहे
उनकी सफलता कोई अचानक मिली उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह 15 वर्षों के संघर्ष, मेहनत और लगातार असफलताओं से सीखने का परिणाम है। उनकी अभिनय यात्रा गांव के स्थानीय मंच “कालिका नाट्य कला परिषद, गोविंदपुर” से शुरू हुई थी। वहीं से उन्होंने अभिनय के प्रति जुनून को पहचानते हुए बड़े सपनों की ओर कदम बढ़ाया। कुमार आर्यन को बॉलीवुड फिल्म “एजुकेशन द टेरर” में बेरोजगार युवक रंजन की भूमिका से पहचान मिली। इस किरदार में उन्होंने ऐसी जान डाली कि पूरे देश में उनकी तारीफ हुई। उन्होंने इस फिल्म के निर्देशक जितेंद्र जैश को अपनी सफलता का बड़ा श्रेय दिया है। मुंबई की फिल्मी दुनिया के संघर्ष पर बात करते हुए कुमार कहते हैं कि “सिर्फ मुंबई पहुंच जाना ही सफलता नहीं है। यहां करोड़ों लोग अपनी पहचान बनाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। सैकड़ों ऑडिशन में रिजेक्शन झेलना पड़ता है, भूखे रहना पड़ता है, लेकिन अगर धैर्य और मेहनत है तो मंजिल जरूर मिलती है।” मानसिक रूप से खुद को मजबूत बनाए रखना पड़ा
उनकी जिंदगी के संघर्ष का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई बार उन्हें भूखे पेट सोना पड़ा, लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ी और मानसिक रूप से खुद को मजबूत बनाए रखना पड़ा। वे कहते हैं कि कठिन परिस्थितियां ही एक कलाकार को निखारती हैं। हालांकि, इस सफर में उन्हें अपने ही गांव और समाज से निराशा भी मिली। उन्होंने बताया कि जब उनकी फिल्म का पोस्टर गांव में लगाया गया, तो कुछ लोगों ने उसे फाड़ दिया। इस घटना ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया, खासकर तब जब पूरा देश सुशांत सिंह राजपूत की मौत से दुखी था। इसके बावजूद कुमार आर्यन ने हार नहीं मानी। वे कहते हैं कि उनका कोई गॉडफादर नहीं है, उनका गॉडफादर सिर्फ भगवान है और उनका संघर्ष ही उनकी पहचान है। फिल्म में वे “अकील अहमद” का किरदार निभा रहे
अब कुमार आर्यन मराठी फिल्म इंडस्ट्री में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने जा रहे हैं। उनकी आगामी मराठी फिल्म में वे “अकील अहमद” का किरदार निभा रहे हैं, जो एक जागरूक कॉलेज छात्र है और बाबा साहब अंबेडकर के सिद्धांतों पर चलता है। खास बात यह है कि इस फिल्म में उनकी भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है कि निर्देशक ने उनके डायलॉग मराठी से हिंदी में कर दिए। यह फिल्म इस वर्ष दिसंबर में रिलीज होने वाली है और अभी से चर्चा में है। यह कहना गलत नहीं होगा कि बिहार का यह युवा कलाकार अब मराठी सिनेमा में भी “धुरंधर” साबित होने की राह पर है। कुमार आर्यन की कहानी यह साबित करती है कि अगर मेहनत सच्ची हो, इरादे मजबूत हों और धैर्य बना रहे, तो किसी भी छोटे गांव से निकलकर भी बड़ा मुकाम हासिल किया जा सकता है।
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