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अररिया सहित सीमांचल क्षेत्र में मखाना की खेती किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है। पारंपरिक रूप से मक्का, गेहूं और धान जैसी फसलों पर निर्भर रहने वाले किसान अब मखाना उत्पादन की ओर रुख कर रहे हैं। कम लागत और बेहतर मुनाफे के कारण यह क्षेत्र के किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक प्रमुख माध्यम बन गया है। पिछले कुछ वर्षों से अररिया सहित सीमांचल के कई इलाकों में किसान बड़े पैमाने पर मखाना की खेती कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि पारंपरिक फसलों की तुलना में मखाना की खेती अधिक लाभकारी साबित हो रही है, जिसके कारण हर साल इसका रकबा बढ़ता जा रहा है। 5 साल से मखाना का उत्पाद कर रहे रंजीत मखाना उत्पादक किसान रंजीत दास ने बताया कि वह पिछले पांच वर्षों से इसकी खेती कर रहे हैं। उनके अनुसार, इस खेती में लागत अपेक्षाकृत कम आती है, जबकि बाजार में अच्छी कीमत मिलने से आमदनी काफी बेहतर होती है। रंजीत को मखाना उत्पादन से प्रति वर्ष लगभग चार से पांच लाख रुपए तक की आय प्राप्त होती है, जिसके चलते उन्होंने इसे अपनी प्रमुख फसल बना लिया है। किसान कालीचरण पासवान का अनुभव भी समान है। उन्होंने बताया कि करीब पांच से छह वर्ष पहले उन्होंने खेती का तरीका बदला और मखाना उत्पादन शुरू किया, जिसका उन्हें आर्थिक रूप से सकारात्मक परिणाम मिला। कालीचरण का कहना है कि मखाना की खेती ने उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि की है और वे अब अन्य किसानों को भी इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। सीमांचल क्षेत्र की जलवायु मखाना उत्पादन के लिए अनुकूल कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सीमांचल क्षेत्र की जलवायु और जल संसाधन मखाना उत्पादन के लिए अनुकूल हैं। यदि किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण, बेहतर बाजार व्यवस्था और सरकारी सहायता मिले, तो यह क्षेत्र मखाना उत्पादन का एक बड़ा केंद्र बन सकता है। मखाना की बढ़ती खेती न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही है, बल्कि सीमांचल की कृषि को भी नई पहचान दे रही है। खेती में यह बदलाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, जहां किसान आधुनिक सोच के साथ नई संभावनाओं को अपनाकर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं।
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