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यूट्यूब से आइडिया लेकर युवाओं ने खड़ा किया पोल्ट्री एम्पायर हर महीने कमा रहे हजार रुपये एकड़ के फार्म में से निगरानी…




आज के दौर में ज्यादातर युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। वहीं नालंदा के दो युवाओं ने अपनी मेहनत, सूझबूझ और यूट्यूब की ताकत से एक ऐसी मिसाल कायम की है, जो हर किसी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। हम बात कर रहे हैं नालंदा जिले के चंडी प्रखंड अंतर्गत आने वाले दरियापुर गांव के रहने वाले दो होनहार और इंटर पास युवाओं— राजीव कुमार और सूरज कुमार की। इन दोनों दोस्तों ने पारंपरिक खेती और छोटी-मोटी नौकरियों को छोड़कर देसी मुर्गी पालन का ऐसा शानदार स्टार्टअप शुरू किया है, जिसने इनकी जिंदगी पूरी तरह से बदल कर रख दी है। एक वक्त था जब ये दोनों महीने के बमुश्किल 10 हजार रुपये कमा पाते थे, लेकिन आज अपने पोल्ट्री फार्म के जरिए ये हर महीने 60 से 70 हजार रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं। एक एकड़ के विशाल भूखंड पर फैला इनका फार्म आज न सिर्फ बिहार, बल्कि पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल तक अपनी मुर्गियों की सप्लाई कर रहा है। कभी 10 हजार रुपये की कमाई में सिमटी थी जिंदगी इस सफलता के पीछे की कहानी इतनी आसान नहीं थी। राजीव और सूरज की पृष्ठभूमि बिल्कुल सामान्य मध्यवर्गीय ग्रामीण परिवार की रही है। दोनों ने केवल इंटरमीडिएट (12वीं कक्षा) तक की पढ़ाई की है। रोजगार की तलाश में और परिवार का भरण-पोषण करने के लिए दोनों ने अलग-अलग काम अपनाए। राजीव कुमार पहले एक छोटी सी इलेक्ट्रॉनिक की दुकान चलाते थे। दिन भर की कड़ी मशक्कत और दुकान पर बैठने के बावजूद महीने के अंत में उनके हाथ बमुश्किल 10 हजार रुपये ही आ पाते थे। वहीं, उनके साथी सूरज कुमार की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। सूरज पहले अपने गांव में पारंपरिक खेती बाड़ी करते थे। खेती से जब आमदनी नहीं बढ़ी, तो उन्होंने बिजली विभाग में ठेकेदारी (कंट्रैक्टर) का काम भी शुरू किया। सूरज बताते हैं कि खेती और बिजली विभाग में ठेकेदारी का काम करने के बावजूद आर्थिक स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हो रहा था। दिन-रात की मेहनत के बाद भी महीने के 10-12 हजार रुपये ही बच पाते थे, जिससे आज के महंगाई के दौर में परिवार चलाना और भविष्य संवारना बेहद मुश्किल था। यूट्यूब बना ‘डिजिटल गुरु’, आरा से लेकर समस्तीपुर तक की खाक छानी ये कहते हैं कि जब इंसान कुछ नया करने की ठान लेता है, तो रास्ते खुद-ब-खुद बनते चले जाते हैं। राजीव और सूरज के मन में भी खुद का कुछ बड़ा व्यवसाय करने की ललक थी। इसी दौरान राजीव ने वीडियो शेयरिंग प्लेटफॉर्म ‘यूट्यूब’ पर मुर्गी पालन से जुड़े कुछ वीडियो देखे। उन वीडियोज में बताया गया था कि कैसे देसी मुर्गियों का पालन कर कम लागत में बेहतरीन मुनाफा कमाया जा सकता है। यूट्यूब से आइडिया मिलने के बाद दोनों ने सिर्फ हवा में तीर नहीं चलाया, बल्कि धरातल पर उतरकर इसकी हकीकत जानने का फैसला किया। राजीव बताते हैं कि यूट्यूब पर वीडियो देखने के बाद हमने तय किया कि हम खुद जाकर सफल पोल्ट्री फार्मर्स से मिलेंगे। इसके लिए हम दोनों ने बिहार के कई जिलों का दौरा किया। हम आरा, लखीसराय और समस्तीपुर गए। वहां जाकर हमने कई बड़े और सफल मुर्गी फार्म का मुआयना किया, उनके मालिकों से बातचीत की और मुर्गी पालन की बारीकियों को समझा।” इस ‘फील्ड रिसर्च’ ने दोनों दोस्तों के आत्मविश्वास को काफी बढ़ा दिया। उन्होंने समझ लिया कि अगर सही तकनीक, सही नस्ल और थोड़ी सी मेहनत की जाए, तो मुर्गी पालन घाटे का नहीं, बल्कि भारी मुनाफे का सौदा है। इसके बाद दोनों ने अपनी पुरानी नौकरियों को अलविदा कह दिया और पार्टनरशिप (साझेदारी) में दरियापुर गांव में मुर्गी पालन का व्यवसाय शुरू करने का ऐतिहासिक फैसला लिया। रखरखाव में भारी खर्च आता है आमतौर पर जब कोई मुर्गी पालन शुरू करता है, तो वह सफेद रंग वाले ब्रॉयलर मुर्गों का चुनाव करता है, जो 30 से 35 दिन में तैयार हो जाते हैं। लेकिन ब्रॉयलर मुर्गियों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनके रखरखाव में भारी खर्च आता है। उन्हें महंगी दवाइयां, सुई और महंगा रेडीमेड फीड देना पड़ता है। जरा सी बीमारी आने पर हजारों मुर्गियां एक साथ मर जाती हैं, जिससे फार्मर को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इन तमाम रिस्क फैक्टर को समझते हुए राजीव और सूरज ने एक बेहद स्मार्ट कारोबारी फैसला लिया। उन्होंने ब्रॉयलर की जगह ‘सोनाली’ नस्ल की देसी मुर्गियों का पालन शुरू किया। सोनाली मुर्गियों की खासियत यह है कि इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत शानदार होती है और ये देसी मुर्गियों की तरह ही दिखती और स्वाद में भी वैसी ही होती हैं। मुर्गी को प्राकृतिक माहौल में पालते राजीव इस नस्ल की खूबियां गिनाते हुए कहते हैं कि सोनाली मुर्गी का रखरखाव सफेद वाले ब्रॉयलर मुर्गे से बहुत आसान है। उसे तो 30 दिन में सुई और महंगी दवाइयों के दम पर तैयार किया जाता है, लेकिन इसमें ऐसा कुछ नहीं है। सोनाली मुर्गी को हम प्राकृतिक माहौल में पालते हैं। ये हरी घास, सब्जियों के वेस्टेज और घर का सामान्य दाना खाकर बड़ी हो जाती हैं। इनका मांस ब्रॉयलर की तुलना में बहुत स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक होता है, इसलिए बाजार में इसकी मांग और कीमत हमेशा ज्यादा रहती है।” मालदा से आता है चूजा, 1 एकड़ के फार्म में सीसीटीवी से होती है निगरानी राजीव और सूरज ने अपने इस काम को पूरी तरह से पेशेवर अंदाज में शुरू किया है। उनका यह पोल्ट्री फार्म पूरे एक एकड़ के विशाल क्षेत्रफल में फैला हुआ है, जहां मुर्गियों को खुले में घूमने और प्राकृतिक रूप से बढ़ने का पूरा मौका मिलता है। वे अच्छी गुणवत्ता वाले चूजे पश्चिम बंगाल के मालदा जिले से मंगवाते हैं। अपने फार्म की सुरक्षा और मुर्गियों की गतिविधियों पर चौबीसों घंटे नजर रखने के लिए इन दोनों युवा उद्यमियों ने पूरे एक एकड़ के परिसर को सीसीटीवी कैमरों से लैस कर रखा है। इंटर पास होने के बावजूद तकनीक का यह बेहतरीन इस्तेमाल साबित करता है कि अगर सोच आधुनिक हो, तो सफलता कदम चूमती है। लागत और मुनाफे का शानदार गणित किसी भी व्यवसाय की सफलता उसके ‘प्रॉफिट मार्जिन’ पर निर्भर करती है। राजीव और सूरज का बिजनेस मॉडल इतना सटीक है कि वे हर मुर्गी पर 100 प्रतिशत का मुनाफा कमा रहे हैं। दोनों बताते हैं कि एक चूजे को मालदा से लाने और उसे बड़ा कर बेचने लायक तैयार करने में कुल 150 रुपये की लागत आती है। जब यह मुर्गी तैयार हो जाती है, तो हम इसे थोक बाजार में 300 रुपये प्रति पीस के हिसाब से सप्लाई करते हैं। यानी प्रति मुर्गी सीधे तौर पर 150 रुपये की बचत होती है। सूरज बताते हैं कि वे हर तीन महीने की साइकिल में लगभग 1500 बच्चे (चूजे) एक बैच में डालते हैं। सभी खर्च (चारा, लेबर, बिजली आदि) काटकर उन्हें एक छोटे बैच से ही 80 से 90 हजार रुपये की शुद्ध बचत हो जाती है। वर्तमान में उन्होंने अपने काम को काफी बढ़ा लिया है। अब उनके फार्म में बड़े पैमाने पर रोटेशन होता है, जिससे वे महीने का औसतन 6000 मुर्गियों का उत्पादन करने में सक्षम हो गए हैं। इस बेहतरीन टर्नओवर के चलते आज दोनों पार्टनर हर महीने 60 से 70 हजार रुपये का शुद्ध मुनाफा अपनी जेब में डाल रहे हैं, जो उनकी पुरानी 10 हजार की नौकरी से 6 से 7 गुना अधिक है। बंगाल से लेकर बिहार के कई जिलों में फैला है मार्केट मुर्गी पालन में सबसे बड़ी चुनौती बाजार तलाशने की होती है, लेकिन इन दोनों युवाओं ने अपनी बेहतरीन नेटवर्किंग से इसे भी आसान बना लिया है। इनकी ‘सोनाली’ मुर्गियों की क्वालिटी इतनी अच्छी है कि आज इनकी डिमांड सिर्फ नालंदा जिले तक सीमित नहीं है। वर्तमान में राजीव और सूरज अपने फार्म की मुर्गियां पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले तक सप्लाई कर रहे हैं। इसके अलावा राजधानी पटना, बिहारशरीफ (जिला मुख्यालय), अपने स्थानीय बाजार चंडी, नवादा और कतरीसराय जैसे इलाकों में इनकी मुर्गियों की भारी मांग है। व्यापारी खुद इनके फार्म पर आकर माल लोड कर ले जाते हैं। युवाओं के नाम संदेश: “रोजगार मांगने वाले नहीं, रोजगार देने वाले बनें” आज के दौर के वे युवा जो बेरोजगारी का रोना रोते हैं, उनके लिए राजीव और सूरज का यह स्टार्टअप एक बड़ा सबक है। राजीव कुमार युवाओं को संदेश देते हुए कहते हैं, “इस काम में पैसा बहुत है, बस आपको थोड़ी मेहनत करने की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि आपको 24 घंटे इसी में लगे रहना है। हम लोग सुबह सिर्फ दो घंटे और शाम को दो घंटे (कुल 4 घंटे) अपने फार्म पर कड़ी मेहनत करते हैं। बाकी समय हम अपने परिवार और अन्य कामों को दे सकते हैं। अगर युवा दृढ़ निश्चय कर लें, तो वे किसी भी फील्ड में झंडे गाड़ सकते हैं। सूरज कहते हैं कि जो युवा 10-15 हजार की नौकरी के लिए दर-दर भटक रहे हैं, उन्हें अपने गांव की मिट्टी से जुड़कर कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में ऐसे ही स्टार्टअप शुरू करने चाहिए। इससे न सिर्फ वे खुद आर्थिक रूप से सशक्त होंगे, बल्कि समाज के अन्य लोगों को भी रोजगार दे सकेंगे।



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