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भोजपुर के बिलौटी गांव में पुलिस मुठभेड़ में मारे गए भरत भूषण तिवारी को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। आरा सांसद सुदामा प्रसाद ने इस एनकाउंटर को फर्जी करार देते हुए बिहार सरकार और पुलिस प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि यह कोई मुठभेड़ नहीं, बल्कि एक निर्दोष युवक की सुनियोजित हत्या है। मामले की निष्पक्ष जांच, दोषी पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने, मृतक के परिजनों को 50 लाख रुपए मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की मांग की है। सुदामा प्रसाद ने बिहार सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि जिस घटना को पुलिस मुठभेड़ बता रही है, वह वास्तव में एक निर्दोष युवक की हत्या है। दो दिन पहले भोजपुर के मसाढ़ गांव में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात कही थी। मुख्यमंत्री द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को शोभा नहीं देती। बिलौटी गांव में जो कुछ हुआ, वह उसी मानसिकता का परिणाम प्रतीत होता है। ‘विस्थापित परिवारों की समस्या उठा रहा था’ सुदामा प्रसाद ने कहा कि पुलिस पहले भरत तिवारी को मानसिक रूप से बीमार बता रही थी, जबकि वह लगातार जवइनिया गांव के बाढ़ पीड़ितों और विस्थापित परिवारों की समस्याओं को उठाने का काम कर रहे थे। क्षेत्र के कई परिवार आज भी बाढ़ की त्रासदी झेल रहे हैं। उन्हें न तो मुआवजा मिला, न रहने के लिए जमीन और न ही आवास योजना का लाभ। महिलाएं और बच्चे खुले आसमान के नीचे जीवन बिताने को मजबूर हैं। उनकी पार्टी ने कई बार इन मुद्दों को सरकार के समक्ष उठाया, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। भरत तिवारी भी विस्थापित परिवारों की समस्याओं को लेकर चिंतित रहते थे और चाहते थे कि सरकार उनकी सुध ले। काननू-व्यवस्था पर उठाए सवाल सांसद ने वायरल वीडियो का जिक्र करते हुए कहा कि उसमें साफ दिखाई दे रहा है कि भरत तिवारी पुलिस के सामने अपना पिस्टल फेंक देता है। इसके बावजूद पुलिस द्वारा गोली चलाना सवाल खड़े करता है। पुलिस का दावा है कि पैर में गोली मारी गई, जबकि शरीर के अन्य हिस्सों में भी गोली लगने की बात सामने आ रही है। यदि आरोपी निहत्था हो चुका था तो उसे गिरफ्तार किया जा सकता था। उनकी पार्टी हथियार दिखाकर पुलिस को धमकाने जैसी किसी भी कार्रवाई का समर्थन नहीं करती, लेकिन कानून के तहत गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी। पुलिस को किसी व्यक्ति को जान से मारने का अधिकार नहीं है, खासकर तब जब वह आत्मसमर्पण की स्थिति में हो। बिहार में दिनदहाड़े डकैती, हत्या और गैंगरेप जैसी घटनाएं हो रही हैं। ‘जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों और कर्मियों पर हत्या का केस होना चाहिए’ सुदामा प्रसाद ने आगे कहा कि सोना-चांदी के व्यवसायियों को अपराधी निशाना बना रहे हैं, लेकिन ऐसे मामलों में पुलिस की सक्रियता नहीं दिखती। इसके विपरीत बिलौटी जैसी घटनाओं में पुलिस की कार्रवाई विवादों में घिर जाती है। इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए। एनकाउंटर में शामिल सभी जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों और कर्मियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाए। भरत तिवारी अपने परिवार की एकमात्र उम्मीद थे। उनकी मौत से एक मां ने अपना बेटा और एक बहन ने अपना भाई खो दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि थाना प्रभारी समेत कुछ पुलिसकर्मियों को निलंबित कर सरकार मामले की लीपापोती करने की कोशिश कर रही है। इस घटना की जितनी निंदा की जाए, वह कम है और पीड़ित परिवार को न्याय मिलना चाहिए।
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