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पूर्व सांसद आनंद मोहन ने एक बार फिर अपने बेबाक बयानों से बिहार की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने पार्टी की कार्यशैली, सर्वे रिपोर्ट, टिकट वितरण और समाज के प्रतिनिधित्व को लेकर खुलकर अपनी राय रखी। उनके बयान को आगामी विधानसभा चुनाव और बदलते राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रविवार को मोतिहारी में अपने संबोधन में आनंद मोहन ने कहा, सर्वे रिपोर्ट सभी नेताओं और दलों के लिए तैयार की जाती है, लेकिन कुछ लोगों के लिए वही रिपोर्ट कड़वी साबित होती है। उन्होंने इशारों-इशारों में पार्टी के अंदर टिकट वितरण और राजनीतिक फैसलों पर भी सवाल खड़े किए। सर्वे रिपोर्ट और टिकट वितरण पर साधा निशाना आनंद मोहन ने कहा, राजनीतिक दलों को समय-समय पर मिलने वाली सर्वे रिपोर्ट को गंभीरता से लेना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि हालिया सर्वे में शिवहर सीट से विधायक चेतन आनंद की हार की संभावना जताई गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई ऐसे लोगों को टिकट दिया गया, जिनका पार्टी के लिए कोई विशेष योगदान नहीं रहा। इसके बावजूद उन्हें न केवल चुनाव लड़ने का अवसर मिला, बल्कि वे विधायक और बाद में मंत्री पद तक पहुंच गए। उनके इस बयान को पार्टी नेतृत्व और टिकट वितरण प्रक्रिया पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है। झारखंड के राजनीतिक हालात का भी किया जिक्र अपने संबोधन के दौरान आनंद मोहन ने झारखंड की राजनीति का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां राजनीतिक परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। उन्होंने कहा कि राजपुर साफ हो गया, जिससे उन्होंने राजनीतिक बदलाव और सत्ता समीकरणों की ओर संकेत किया। हालांकि उन्होंने किसी दल या नेता का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके बयान को क्षेत्रीय राजनीति और चुनावी परिदृश्य से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी के भीतर नाराजगी भी आई सामने आनंद मोहन ने अपने बयान में पार्टी के अंदरूनी माहौल को लेकर भी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि जब वे अपने समाज और उसके अधिकारों की बात करते हैं तो कुछ लोग इसका विरोध करने लगते हैं। उन्होंने तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि कुछ लोग पार्टी का “पट्टा गले में बांधकर एनसीसीएन की तरह भौंकने लगते हैं।” उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। इसे पार्टी के भीतर मौजूद मतभेदों और असंतोष के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। समाज के नेताओं पर भी साधा निशाना पूर्व सांसद ने कहा कि उनके समाज के कई नेता सांसद बनकर संसद तक पहुंचे हैं, लेकिन समाज के मुद्दों को प्रभावी ढंग से नहीं उठा पाए। उन्होंने ऐसे जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप काम नहीं हो रहा है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि कई लोग अपने दायित्वों का निर्वहन ठीक ढंग से नहीं कर रहे हैं और समाज की समस्याओं को मजबूती से उठाने में विफल साबित हुए हैं। राजनीतिक हलकों में बयान की चर्चा आनंद मोहन के इस बयान के बाद बिहार की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनके बयान को केवल व्यक्तिगत प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह आगामी चुनावों से पहले सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने की कोशिश भी हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार की राजनीति में सामाजिक समीकरण हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में आनंद मोहन द्वारा समाज के प्रतिनिधित्व और टिकट वितरण का मुद्दा उठाना आने वाले दिनों में राजनीतिक दलों के लिए चुनौती बन सकता है। चुनावी रणनीति से जोड़कर देखे जा रहे बयान राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विधानसभा चुनाव से पहले इस तरह के बयान पार्टी के भीतर दबाव बनाने और सामाजिक आधार को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं। हालांकि आनंद मोहन ने सीधे तौर पर किसी व्यक्ति या दल का नाम लेकर हमला नहीं किया, लेकिन उनके बयान के कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। फिलहाल उनके बयान पर विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।
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