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औरंगाबाद सदर अस्पताल में दिव्यांगों का हंगामा कैंप में डॉक्टर के नहीं पहुंचने से नाराजगी यूआईडी कार्ड बनाने के लिए लगा था कैंप…




औरंगाबाद सदर अस्पताल में आज दिव्यांगों के लिए आयोजित विशेष यूआईडी कार्ड कैंप अव्यवस्था का शिकार हो गया, जिसके कारण दूर-दराज से आए लोगों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी। जिलाधिकारी के निर्देश पर सिविल सर्जन को इस कैंप का आयोजन करने का आदेश दिया गया था और इसकी सूचना भी पूर्व में दिव्यांगजनों तक पहुंचाई गई थी। इसी सूचना के आधार पर बड़ी संख्या में दिव्यांग अपने परिजनों के साथ सुबह से ही सदर अस्पताल पहुंच गए थे। हालांकि, कैंप में जिस महिला चिकित्सक की ड्यूटी लगाई गई थी, उनके अनुपस्थित रहने के कारण न तो दिव्यांगों की मेडिकल जांच हो सकी और न ही यूआईडी कार्ड बनाने की प्रक्रिया शुरू हो पाई। घंटों इंतजार के बावजूद जब कोई डॉक्टर नहीं पहुंचा, तो वहां मौजूद दिव्यांग और उनके परिजन आक्रोशित हो उठे और अस्पताल परिसर में हंगामा करने लगे। लोगों का कहना था कि भीषण गर्मी में वे लोग सुबह से लाइन में खड़े हैं, लेकिन प्रशासन की लापरवाही के कारण उनका काम नहीं हो सका। प्रभारी सिविल सर्जन बोले- अनुपस्थित डॉक्टर पर होगी कार्रवाई परिजनों ने आरोप लगाया कि यह सीधे तौर पर जिलाधिकारी के आदेश की अवहेलना है। उन्होंने इसकी सूचना जिला पदाधिकारी को भी दी, जिसके बाद प्रभारी सिविल सर्जन डॉ. रवि रंजन सदर अस्पताल पहुंचे और मामले की जानकारी ली। जांच के दौरान पता चला कि सिविल सर्जन कार्यालय से संबंधित महिला चिकित्सक को कैंप की सूचना भेजी गई थी, लेकिन चिकित्सक ने ऐसी किसी भी सूचना से अनभिज्ञता जताई।प्रभारी सिविल सर्जन ने पूरे मामले की जांच कराने की बात कही है। उन्होंने बताया कि हड्डी रोग विशेषज्ञ के उपलब्ध नहीं होने के कारण भी कुछ प्रक्रियाएं पूरी नहीं हो सकीं। उन्होंने आश्वासन दिया कि जिन दिव्यांगों का यूआईडी कार्ड नहीं बन पाया है, उनके लिए 15 मई को फिर से कैंप आयोजित किया जाएगा। साथ ही, मौके पर मौजूद कुछ दिव्यांगों की जांच कराने का प्रयास भी किया गया। डीएम के आदेश की अवहेलना इस घटना ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिलाधिकारी के स्पष्ट निर्देश के बावजूद यदि संबंधित चिकित्सकों तक सूचना सही तरीके से नहीं पहुंचती या वे ड्यूटी पर उपस्थित नहीं होते हैं, तो यह प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है। सबसे अधिक परेशानी उन दिव्यांगजनों को उठानी पड़ी, जो उम्मीद लेकर आए थे, लेकिन निराश होकर लौटने को मजबूर हुए।



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