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Vrindavan Style Celebration at Niranjan Swami Temple, Samastipur


समस्तीपुर जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर पटोरी अनुमंडल के धमौन गांव में वृंदावन की तर्ज पर लोगों ने छाता होली खेली। धमौन वासियों के कुल गुरु निरंजन स्वामी के मंदिर परिसर में बुधवार रात लोगों का जुटान हुआ। जहां 30 से ज्यादा टोली की छाता आकर्षण

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निरंजन स्वामी संचालन समिति की ओर से बेहतर छाता बनाने वाले टोली को पुरस्कृत भी किया जाएगा। मंदिर परिसर में रात के 12:00 बजे तक 50 हजार से अधिक लोगों की भीड़ जुटी हुई थी । इस भीड़ में धमौन के 5 पंचायत के लोगों के अलावा आसपास के प्रखंड और पंचायत के ग्रामीण भी बड़ी संख्या में पहुंचे थे। भीड़ को देखते हुए पुलिस बलों की भी जगह-जगह पर तैनाती की गई थी।

निरंजन स्वामी मंदिर परिसर में लोगों की भीड़।

निरंजन स्वामी मंदिर परिसर में लोगों की भीड़।

रंग-बिरंगी छाता लेकर पहुंचते हैं लोग

होली खेलने के लिए पहुंचे लोगों ने बताया कि सभी टोली पहले अपने-अपने टोले-मोहल्ले से निकलकर गांव के एक-एक घरों पर पहुंचे। वहां पर होली गीत गया फिर छाता लेकर आगे बढ़े। होली के दिन करीब 4:00 से शुरू हुआ यह कार्यक्रम शाम ढलने के बाद शोभा यात्रा का रूप लेकर निरंजन स्वामी मंदिर परिसर में केंद्रित हो गया। जहां पर लोग अपनी-अपनी टोली के बीच होली गीत गाते हुए नजर आए। रंग-बिरंगे छाते लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था।

छाता बना आकर्षक का केंद्र।

छाता बना आकर्षक का केंद्र।

500 साल पुराना है छाता होली का इतिहास

यहां वृंदावन के बरसाने की होली की तर्ज पर होली का उत्सव मनाया जाता है। यह उत्सव केवल रंगों का खेल नहीं है, बल्कि यह गांव की सांस्कृतिक धरोहर, एकता और भाईचारे का जीवंत प्रतीक बन चुका है। अपनी अनूठी परंपरा और सांस्कृतिक गहराई के कारण एक अलग पहचान बनाई है।

यहां किसी भी प्रकार का जाति, धर्म या संप्रदाय का भेदभाव नहीं होता। गांव में हर व्यक्ति अपनी टोली के साथ छतरी तैयार करते हैं और ये छतरियां इतनी बड़ी होती हैं कि इनमें दो दर्जन से अधिक लोग एक साथ होली गीत गा सकते हैं। इस परंपरा का आयोजन सिर्फ एक मजेदार खेल नहीं है, बल्कि यह सामूहिक उत्सव और सामाजिक एकता का प्रतीक बन चुका है।

छाता लेकर पहुंचे लोग।

छाता लेकर पहुंचे लोग।

500 साल पुरानी परंपरी

गांव के बुजुर्ग रामाकांत राय ने बताया कि धमौन की छाता होली की परंपरा करीब 500 सालों से भी पुरानी है। यह परंपरा 15वीं शताब्दी से चली आ रही है, हालांकि छतरियों को नया रूप 1930 से दिया गया था। उस समय नबुदी राय के घर से पहली सुसज्जित छतरी निकाली गई थी, जो इस परंपरा को और भी लोकप्रिय बनाने में सहायक सिद्ध हुई।

बरसाने से कैसे धमौन पहुंची परंपरा

ग्रामीण दिनकर प्रसाद राय ने बताया कि धमौन के लोग उत्तर प्रदेश के संबलगढ पहुंचकर बस गए। संबलगढ के पास ही बरसाना है। वहां छाता बनाकर उसके अंदर होली गीत गाते और रंग गुलाल डालते हैं। यहां आने के बाद लोगों ने इस परंपरा की शुरूआत की। जो पीढी दर पीढ़ी चली आ रही है। होली के दिन, धमौन के लोग सुबह-सुबह स्वामी निरंजन मंदिर में एकत्र होते हैं, जहां वे अपनी छतरियों के साथ अबीर-गुलाल चढ़ाते हैं और ‘धम्मर’ तथा ‘फाग’ गीत गाते हैं।

इसके बाद, छतरियों को कलाबाजी के साथ घुमाया जाता है और घंटियों की आवाज से पूरा गांव गूंज उठता है। यह उत्सव धीरे-धीरे शोभा यात्रा का रूप ले लेता है, जो गांव के विभिन्न घरों में जाती है। देर शाम को झांकियां महादेव स्थान पहुंचती हैं, और वहां मध्य रात्रि के बाद चैता गीतों के साथ होली का समापन होता है।

इसी छाता के नीचे होली होती है।

इसी छाता के नीचे होली होती है।



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