
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की बढ़ती ‘हाफ-एनकाउंटर’ प्रथा पर कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि पुलिस द्वारा आरोपियों के पैरों या गैर-जरूरी हिस्सों में गोली मारकर इसे मुठभेड़ बताना पूरी तरह अस्वीकार्य है। यह सब प्रमोशन, तारीफ या सोशल मीडिया फेम के लिए किया जा रहा है, जो संविधान और कानून के खिलाफ है।
कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि सजा देने का अधिकार केवल अदालत का है, पुलिस का नहीं। पुलिस कानून से ऊपर नहीं है और किसी भी आरोपी को सबक सिखाने के नाम पर गोली चलाना गैरकानूनी है। गैर-जरूरी फायरिंग खासकर पैरों में गोली मारना, नियमित हो गया है। कोर्ट ने इसे पुलिस के अधिकारों का दुरुपयोग बताया।
कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारी तारीफ, समय से पहले प्रमोशन या सोशल मीडिया पर वाहवाही के चक्कर में ऐसे कदम उठा रहे हैं, जो असंवैधानिक है। एनकाउंटर में मौत या गंभीर चोट पर तुरंत FIR दर्ज करने के निर्देश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने जारी की 6-पॉइंट गाइडलाइंस
इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस अरुण कुमार देशवाल की सिंगल बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के PUCL बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) मामले की गाइडलाइंस पर जोर देते हुए पुलिस के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं। ये गाइडलाइंस एनकाउंटर में गंभीर चोट या मौत के मामलों में लागू होंगी।
कोर्ट ने डीजीपी और होम सेक्रेटरी से स्पष्टीकरण मांगा है कि क्या इन निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए कोई आदेश जारी किए गए हैं। साथ ही, एनकाउंटर के तुरंत बाद प्रमोशन या गैलेंट्री अवॉर्ड की सिफारिश नहीं की जाएगी, जब तक जांच में बहादुरी पूरी तरह साबित न हो।
यह फैसला प्रयागराज में सुनाया गया, जहां मिर्जापुर एनकाउंटर से जुड़ी एक जमानत याचिका के दौरान कोर्ट ने यूपी पुलिस की इस प्रवृत्ति पर गहरी चिंता जताई। कोर्ट का मानना है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच स्पष्ट विभाजन है। पुलिस को न्यायिक क्षेत्र में दखल नहीं देना चाहिए।