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हरीश राणा दुनिया को अलविदा कहने के बाद भी दे जाएंगे ये बड़ा संदेश कलेजे पर पत्थर रख पापा लेंगे ये बड़ा फैसला…


Harish Rana Passive Euthanasia

इच्छामृत्यु फैसले के बाद हरीश राणा की ये तस्‍वीर चीर देगी कलेजा | Image:
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Harish Rana: 13 सालों से बिस्तर पर खामोश और बेजान पड़े गाजियाबाद के हरीश राणा इस समय चर्चा में हैं। साल 2013 से चली आ रही उनकी कठिन लड़ाई अब अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए हरीश राणा को एम्स शिफ्ट किया जा चुका है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हरीश के शरीर से लाइफ सपोर्ट से जुड़ी दो पाइप को पहले चरण में हटा दिया गया है। इसमें सांस लेने के लिए ट्रैकियोस्टॉमी ट्यूब और पोषण के लिए पीईजी फीडिंग ट्यूब शामिल हैं।

करीब 13 सालों से वेजिटेटिव स्टेट में जीवन बिता रहे हरीश के पड़ोसी दीपांशु मित्तल बताते हैं कि लंबे समय से असहनीय कष्ट से गुजर रहा शख्स मुक्ति की ओर बढ़ रहा है। लेकिन यह उम्मीद जुड़ी है कि उनके जाने के बाद अंगदान के जरिये कई और लोगों को नई जिंदगी मिल सकती है।

पड़ोसी ने करीब से देखा राणा परिवार का संघर्ष

राजनगर एक्सटेंशन की सोसायटी में रहने वाले दीपांशु मित्तल RWA के एक्जीक्यूटिव मेंबर भी हैं। उनका कहना है कि उन्होंने इस पूरे मामले को बहुत करीब से देखा है। उनके मुताबिक, राणा परिवार ने धैर्य, प्रेम और समर्पण के साथ जिस तरह से बेटे की सेवा की, उसने आसपास के रहने वाले हर व्यक्ति को भावुक कर दिया।

जब हरीश के पिता ने पूछा था ‘वो’ सवाल

दीपांशु ने बताया कि करीब ढाई साल पहले हरीश राणा के पिता अशोक राणा ने उनसे देहदान और अंगदान की प्रक्रिया के बारे में जानकारी ली थी। दीपांशु खुद दधीची देहदान समिति से जुड़े हैं। यह समिति देशभर में अंगदान और बॉडी डोनेशन के लिए लोगों को जागरूक करती है। इसी के चलते उन्होंने उनसे संपर्क किया था। उनका कहना है कि उस वक्त अशोक राणा ने महज जानकारी लेने के लिए ही पूछताछ की थी कि अगर कभी ऐसी स्थिति बनती है तो क्या हरीश के अंग दान किए जा सकते हैं।

‘…जाने के बाद किसी और को जिंदगी मिल जाए’

दीपांशु बताते हैं कि उन्होंने अशोक राणा के पूछने पर उन्हें इसकी पूरी प्रक्रिया समझाई थी। बताया था कि अंगदान तभी संभव है जब डॉक्टरों की टीम द्वारा मेडिकल स्थिति को उपयुक्त माना जाए। उस समय उन्होंने सिर्फ इतना कहा था कि अगर मुमकिन हो तो हरीश के जाने के बाद किसी और को नई जिंदगी मिलनी चाहिए।  

बेटे लिए परिवार द्वारा इच्छामृत्यु मांगने पर दीपांशु कहते हैं कि शायद यह दुनिया का सबसे मुश्किल फैसला है। परिवार पिछले कई सालों से बेटे को कष्ट भोगते देख रहा था। डॉक्टर भी पहले ही उम्मीद छोड़ चुके थे। ऐसे में परिवार ने जो फैसला लिया, वो उनके लिए किसी भी तरह से आसान नहीं है। उनके मुताबिक, परिवार की एक ही इच्छा रही कि सालों से कष्ट भुगत रहे बच्चे को शांति मिल जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु की मंजूरी

अशोक राणा के मुताबिक, बेटे की असाध्य हालत को देखते हुए परिवार पिछले तीन साल से कानूनी लड़ाई लड़ रहा था। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को 32 साल के हरीश राणा के जीवन रक्षक इलाज को रोकने की इजाजत दे दी। अदालत का यह फैसला आने के बाद परिवार हरीश राणा को एंबुलेंस के बजाय अपने निजी वाहन से दिल्ली के एम्स लेकर गया। दीपांशु का कहना है कि डॉक्टरों की निगरानी में पूरी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। 

हरीश राणा की कहानी क्या?

साल 2013 में हुए एक हादसे ने हरीश राणा और उनके परिवार की खुशियां हमेशा-हमेशा के लिए छीन ली। हरीश राणा उस समय पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे। उनकी गिनती होनहार छात्रों में होती थी। यूनिवर्सिटी के पास पीजी की चौथी मंजिल से गिरने के बाद उन्हें शरीर के कई हिस्सों में गंभीर चोटें आई थीं। सिर की चोट की वजह से 100% क्वाड्रिप्लेजिया हो गया। पिछले 13 साल से राणा क्वाड्रिप्लेजिया (चारों अंगों का लकवा) से पीड़ित हैं।

हरीश पिछले 13 सालों से केवल मशीनों के सहारे जीने पर मजबूर हो गए। एम्स की मेडिकल टीम ने अपनी रिपोर्ट में साफ कह दिया था कि उनके ठीक होने की कोई संभावना नहीं बची है। ऐसे में अपने बेटे को तड़पते देखना माता-पिता के लिए मुश्किल होता चला गया। उन्होंने अपने दिल पर पत्थर रखते हुए कोर्ट से बेटे के लिए इच्छामृत्यु की गुहार लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी। इसके बाद अब हरीश राणा सम्मानजनक और दर्दरहित अंतिम यात्रा की ओर हैं।

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