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चतरा वीं सदी में भी खटिया पर बीमार को ढोना पड़ता है सड़क के अभाव में जिंदगी और मौत की लड़ाई…

5 किमी तक खाट पर लादकर ले जाना पड़ा गर्भवती को, मृतकों के शव कंधे पर उठाकर लौटते हैं परिजन

Whani24 विशेष रिपोर्ट | चतरा, 10 अप्रैल 2026

दिल दहलाने वाली सच्चाई

चतरा जिले के कुछ गांवों में सड़क न होने के कारण किसी बीमार या शव को खाट पर लादकर या कंधे पर उठाकर ले जाना पड़ता है। यह कोई 19वीं सदी की कहानी नहीं, बल्कि 2026 में झारखंड के चतरा जिले की वह भयावह हकीकत है जो विकास के दावों की पोल खोल देती है।

गर्भवती महिला की चीख-पुकार

प्रसव पीड़ा से तड़पती निशा को भाजपा के कार्यकर्ताओं ने एक खटिया पर लेटाया और उसे टांगकर पांच किलोमीटर दूर फुफंदी चौक तक पहुंचाया। घंटों तक प्रसव पीड़ा में कराहती रही निशा। परिवार वाले असहाय होकर देखते रहे। न एम्बुलेंस आ सकती थी, न कोई गाड़ी। अंत में भाजपा नेता रमेश कुमार हेंब्रम की पहल पर कुछ ग्रामीणों ने हिम्मत की।

बाबूराम हांसदा, जागेश्वर सोरेन, केशव हांसदा, रोही किस्कू जैसे लोगों ने निशा को खटिया पर लादा और 5 किमी पैदल चलकर फुफंदी चौक तक पहुंचाया। वहां से किसी तरह वाहन मिला और उसे इचाक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया।

भगवान की कृपा से निशा का सुरक्षित प्रसव हुआ। लेकिन सवाल यह है – अगर गर्भवती महिला की जान जाती तो जिम्मेदार कौन होता?

यह पहली घटना नहीं है

इसी वर्ष 9 जून को सुरेंद्र किस्कू की पत्नी मुन्नी देवी को भी प्रसव पीड़ा हुई थी और उन्हें भी खटिया के सहारे ही अस्पताल ले जाया गया था।

शवों को कंधे पर उठाकर लौटना पड़ता है

कारीमांडर एवं बुटकुईया गांव के ग्रामीण अपने मृत परिजनों का शव कंधे पर उठाकर ले जाते हैं क्योंकि सड़क न होने के कारण गांव तक किसी भी वाहन का पहुंचना असंभव है।

कल्पना कीजिए – अस्पताल में किसी प्रियजन का निधन हो गया। दुख की घड़ी में शव को कंधे पर लादकर मीलों पैदल चलना पड़े। यह पीड़ा केवल शब्दों में बयां नहीं की जा सकती।

सड़क क्यों नहीं बन पाई? वन विभाग ने रोका रास्ता

सिलदाग पंचायत: 20 साल से अधूरा सपना

20 साल पहले लावालौंग-पांकी पथ स्थित गड़ियानी मोड़ से नावाडीह-सिलदाग तक सड़क का कालीकरण का कार्य शुरू हुआ था। लेकिन आज 2026 में भी यह सड़क अधूरी पड़ी है।

वन्य प्राणी आश्रयणी क्षेत्र होने के कारण वन विभाग से एनओसी नहीं मिलने की वजह से सड़क नहीं बन पायी। कई बार टेंडर भी हुआ, लेकिन एनओसी के अभाव में काम रुका रहा।

प्रभावित गांवों की सूची

सिलदाग, महुआडीह, खामडीह, नारायणपुर, नावाडीह, सौरू, हांहे, टेवना समेत कई गांव के लोग इस सड़क के अभाव से प्रभावित हो रहे हैं।

ग्रामीणों की पीड़ा – उनकी ही जुबानी

सौरू गांव के पूर्व उप मुखिया बाबूलाल यादव ने कहा कि बीमार लोगों को इलाज के लिए लावालौंग या जिला मुख्यालय ले जाने में काफी परेशानी होती है।

सबसे दर्दनाक बात: गफूर मियां ने कहा कि सड़क नहीं रहने से दूसरे गांव के लोग इस गांव में रिश्ता तय नहीं करना चाहते हैं। सड़क की स्थिति ऐसी है कि इस पर बाइक चलाना भी मुश्किल है।

शादी के रिश्ते भी टूट रहे हैं

सड़क के अभाव के कारण लोग अपनी बेटियों की शादी इन गांवों में नहीं करना चाहते। युवाओं को जीवनसाथी ढूंढने में भी मुश्किल हो रही है। गांव से पलायन बढ़ रहा है।

मंधनिया का रास्ता: बोल्डर बाहर निकल आए

सिलदाग जाने के लिए मंधनिया होकर 20 वर्ष पूर्व पक्की सड़क बनायी गयी थी, जो पूरी तरह उखड़ चुकी है। बोल्डर बाहर निकल आया है। इस पर बाइक तो दूर, पैदल चलना भी लोगों को दूभर हो गया है।

सड़क खराब होने के कारण वाहन चालक उस रास्ते से आने जाने में कतराते हैं।

क्या है समाधान? जनता की मांग

तत्काल करने योग्य कार्य:

  1. वन विभाग से तुरंत एनओसी जारी करवाना – वन्यजीव संरक्षण जरूरी है, लेकिन मानव जीवन भी कम मूल्यवान नहीं
  2. आपातकालीन एयर एम्बुलेंस सेवा – दुर्गम क्षेत्रों के लिए हेलीकॉप्टर सेवा
  3. मोटरेबल रास्ता बनाना – पूरी पक्की सड़क न सही, कम से कम मोटरसाइकिल चल सके ऐसा रास्ता तो बने
  4. बरसाती सीजन से पहले अस्थायी व्यवस्था – बांस या लकड़ी के अस्थायी पुल

नेताओं से सवाल

भाजपा नेता रमेश हेम्ब्रम ने बताया कि सरकार ने वादा करके भी अब तक गांव को सड़क मार्ग से नहीं जोड़ा है। कई बार इस संबंध में बात भी हुई, लेकिन किसी ने ग्रामीणों की बात को गंभीरता से नहीं लिया है।

बरसात में और भयावह हो जाती है स्थिति

बरसात के दिनों में पंचायत के लोगों को प्रखंड व जिला मुख्यालय आने-जाने में काफी परेशानी होती है।

बरसात में तो स्थिति और भी खराब हो जाती है। गांव पूरी तरह कट जाते हैं। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। बीमार लोगों के लिए तो यह जीवन-मरण का सवाल बन जाता है।

विकसित भारत का सपना कब पूरा होगा?

जब देश डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी और विकसित भारत 2047 की बात कर रहा है, तब चतरा के इन गांवों में लोग 21वीं सदी में भी खाट पर बीमार को ढो रहे हैं।

यह केवल चतरा की समस्या नहीं है। यह पूरे झारखंड और भारत के कई दूरदराज इलाकों की कहानी है।


News Whani24 की राय

यह खबर सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं है – यह चीख है उन लाखों लोगों की जो बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जी रहे हैं।

सवाल यह है:

  • क्या वन्यजीव संरक्षण और मानव जीवन में से किसी एक को चुनना होगा?
  • क्या दोनों के बीच संतुलन नहीं बनाया जा सकता?
  • क्या 20 साल में एक सड़क बनाने के लिए एनओसी नहीं मिल सकती?

हम मांग करते हैं:

  1. तत्काल वन विभाग और सड़क निर्माण विभाग की संयुक्त बैठक
  2. 30 दिन में समाधान का रोडमैप
  3. आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की तत्काल व्यवस्था

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