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आगामी 13 से 16 फरवरी के बीच होने वाली वैश्विक पक्षी गणना ‘ग्रेट बैकयार्ड बर्ड काउंट’ (जीबीबीसी) से पहले बिहार में पक्षी प्रेमियों और पर्यावरणविदों की गतिविधियां तेज हो गई है। पिछले वर्ष की तुलना में राज्य में इस नागरिक विज्ञान कार्यक्रम में भागीदारी दोगुनी से अधिक होने की संभावना है। बिहार में लगातार बढ़ रही भागीदारी 2021 में जहां केवल 17 बर्ड वॉचर्स ने 33 चेकलिस्ट के साथ 133 प्रजातियों को दर्ज किया था, वहीं 2025 के प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार 49 बर्ड वॉचर्स ने 500 चेकलिस्ट सबमिट करते हुए 224 प्रजातियों को रिकॉर्ड किया है। यह वृद्धि राज्य के 15 जिलों से दर्ज की गई है। राज्य समन्वयक राहुल कुमार बताते हैं कि 2024 में बिहार ने देश के 37 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चेकलिस्ट में 24वां स्थान हासिल किया था। हालांकि यह प्रगति उत्साहजनक है, लेकिन राज्य की वास्तविक क्षमता इससे कहीं अधिक है। भारत की वैश्विक मौजूदगी पिछले वर्ष (14 से 17 फरवरी 2025) भारत ने विश्व स्तर पर प्रभावशाली प्रदर्शन किया था। लगभग 6,500 बर्ड वॉचर्स ने 66,155 चेकलिस्ट सबमिट कर देश को दूसरे स्थान पर पहुंचाया, जबकि 1,086 प्रजातियों के साथ भारत तीसरे स्थान पर रहा। नालंदा के जलाशय: संकट में पारिस्थितिकी धरोहर इस बढ़ती भागीदारी के बीच नालंदा जिले के महत्वपूर्ण जलाशयों की दुर्दशा चिंता का विषय बन गई है। गिद्धि जलाशय (कुंडलपुर-बेगमपुर), पुष्पकर्णी जलाशय (सूरजपुर), पंचाने नदी (गिरियक), पावापुरी जल मंदिर और गिरियक डैम जैसे महत्वपूर्ण आद्रभूमि क्षेत्र गंभीर खतरे में हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि इन जलाशयों पर अवैध अतिक्रमण, लीज पर दिया जाना और उचित प्रबंधन के अभाव में पक्षियों की आबादी में लगातार गिरावट आ रही है। ये आद्रभूमियां न केवल पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि स्थानीय समुदायों को सिंचाई, जल आपूर्ति, भूजल स्तर बनाए रखने और प्रदूषण नियंत्रण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पर्यटन की अपार संभावनाएं विशेष रूप से गिद्धि और पुष्पकर्णी जलाशय नालंदा विश्वविद्यालय के भग्नावशेष, ह्वेन त्सांग मेमोरियल हॉल और कुंडलपुर मंदिर के निकट स्थित हैं, जो इनके महत्व को और बढ़ा देता है। यहां पर्यावरणीय पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं, लेकिन पहले इनके पारिस्थितिकीय महत्व को संरक्षण देने की जरूरत है। तत्काल कार्रवाई की मांग पर्यावरणविद् इन जलाशयों को लीज मुक्त करने, घेराबंदी करने और अवैध अतिक्रमण से मुक्त कराने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि तत्काल प्रयास नहीं किए गए तो ये क्षेत्र पक्षी विहीन हो जाएंगे, जिससे पारिस्थितिकीय असंतुलन पैदा होगा।
जलाशयों के समीप शोध और संरक्षण केंद्र स्थापित करने की भी मांग की जा रही है, जो जागरूकता और शिक्षा को बढ़ावा दे सके। यह एक सतत प्रक्रिया है जिसमें आम नागरिक, सरकार, विभाग, संस्थाएं, पर्यावरणविद और पक्षी प्रेमी सभी को शामिल होना होगा। ई-बर्ड और मर्लिन ऐप से आसान भागीदारी इस वैश्विक कार्यक्रम में भाग लेना अब पहले से कहीं आसान हो गया है। पक्षी प्रेमी ई-बर्ड फोन ऐप पर अपनी गणना दर्ज कर सकते हैं, जबकि मर्लिन बर्ड आईडी ऐप पक्षियों की पहचान में मदद करती है। यह ऐप पक्षियों की आवाज, तस्वीर या आकार, रंग और स्थान की जानकारी के आधार पर प्रजातियों की पहचान बता सकती है। प्रधानमंत्री के सतत विकास और वन्यजीव संरक्षण के सपने को साकार करने के लिए इन जलाशयों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। अन्य जिलों में सरकारी पहल और पक्षी प्रेमियों के प्रयास प्रशंसनीय रहे हैं, नालंदा में भी इसी तरह के प्रयासों की दरकार है।
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