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यूजीसी संशोधित बिल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन लगातार तेज होता जा रहा है। इसी क्रम में बुधवार को आरा रमना मैदान के गेट के पास सामान्य वर्ग समन्वय समिति के बैनर तले एक दिवसीय धरना दिया गया। धरना कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षाविद, छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए, जिन्होंने केंद्र सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और यूजीसी संशोधित बिल को तत्काल वापस लेने की मांग की। सामान्य वर्ग समन्वय समिति ने अधिनियम को निरस्त करने की मांग की सामान्य वर्ग समन्वय समिति ने इस अधिनियम को निरस्त करने की मांग करते हुए इसे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, योग्यता आधारित व्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर खतरा बताया है। समिति का कहना है कि शैक्षणिक सुधार के नाम पर लाया गया यह कानून वास्तव में विश्वविद्यालयों को स्वतंत्र ज्ञान केंद्रों के बजाय केंद्रीय नियंत्रण की इकाइयों में बदलने की दिशा में ले जा रहा है, जो भारतीय संविधान की भावना और संघीय ढांचे के विपरीत है। समिति ने पीएम मोदी के नाम सौंपे गए मांग पत्र में क्या कहा है? समिति ने प्रधानमंत्री के नाम सौंपे गए मांग-पत्र में कहा है कि यूजीसी संशोधन एक्ट 2026 के प्रावधान अकादमिक निर्णयों में प्रशासनिक और राजनीतिक हस्तक्षेप को बढ़ावा देते हैं। इससे पाठ्यक्रम निर्धारण, शिक्षकों की नियुक्ति, पदोन्नति प्रक्रिया और शोध की स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है। संगठन का आरोप है कि यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) और 21 के तहत प्रदत्त बौद्धिक स्वतंत्रता के अधिकारों का भी हनन करता है। ‘यूजीसी के संशोधित बिल को लेकर युवाओं, छात्रों के भविष्य पर गंभीर सवाल’ सामान्य वर्ग समन्वय समिति की सदस्य अर्चना सिंह ने कहा कि यूजीसी के संशोधित बिल को लेकर युवाओं और छात्रों के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वक्ता ने कहा कि स्कूल या विश्वविद्यालय में पढ़ते समय किसी विद्यार्थी के मन में यह भावना नहीं होती कि वह सामान्य वर्ग, ओबीसी या एससी-एसटी से है। उन्होंने कहा कि सभी छात्र आपस में मित्रवत रहते हैं, लेकिन यह बिल छात्र जीवन से ही वर्गीय विभाजन की भावना पैदा करेगा। खासकर सामान्य वर्ग के छात्र खुद को दोयम दर्जे का नागरिक समझने लगेंगे और डर के माहौल में जीने को मजबूर होंगे। उन्होंने आशंका जताई कि बिल के प्रावधानों के कारण शिकायत की स्थिति में पहले जेल जाने जैसी कठोर प्रक्रिया छात्रों के मानसिक संतुलन को बिगाड़ सकती है। इससे या तो छात्र गलत संगत में जाएंगे या आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर होंगे। वक्ता ने यह भी कहा कि यह बिल ओबीसी, एससी और एसटी छात्रों के हित में भी नहीं है, क्योंकि अति-प्रोटेक्शन से अनुशासनहीनता बढ़ेगी और आने वाली पीढ़ी पर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा। उन्होंने युवाओं के हित में बिल को वापस लेने की मांग मांग-पत्र में चार सूत्री प्रमुख मांगें रखी गई
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