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नालंदा की स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह पटरी से उतर गई है। बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ (भासा) के आह्वान पर जिलेभर के सरकारी अस्पतालों में 36 घंटे के कार्य बहिष्कार की घोषणा की गई है। आंदोलन के 24 घंटे बीत जाने के बाद भी गतिरोध बना हुआ है। ओपीडी के जनरल वार्डों में ताले लटके हुए हैं। पर्ची काउंटर बंद रहने और डॉक्टरों के ड्यूटी पर न रहने से दूर-दराज से पहुंचे सैकड़ों मरीज बिना इलाज कराए लौटने को मजबूर हैं। हालांकि इमरजेंसी सेवा बहाल रहने की वजह से मरीजों को थोड़ी राहत जरूर मिल रही है। पत्रकार-डॉक्टर विवाद के बाद भड़का आक्रोश विवाद की मुख्य वजह सहरसा सदर अस्पताल की वह घटना है, जहां पत्रकार और डॉक्टरों के बीच टकराव हुआ था। आरोप है कि मामले के तूल पकड़ने के बाद स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन ने एकतरफा रुख अपनाते हुए डॉक्टरों पर ही दंडात्मक कार्रवाई कर दी। इस प्रशासनिक फैसले से नाराज होकर भासा ने नालंदा जिले के तमाम सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में ओपीडी सेवाओं का पूर्ण बहिष्कार शुरू कर दिया।
मनगढ़ंत रिपोर्ट पर कार्रवाई का आरोप, 72 घंटे की मियाद पूरी बिहार शरीफ सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. राजीव रंजन ने प्रशासनिक कार्रवाई को सिरे से खारिज करते हुए इसे दमनात्मक कदम बताया है। उन्होंने कहा कि सहरसा सदर अस्पताल के तत्कालीन प्रभारी अधीक्षक डॉ. एस. के. आजाद और चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. रौशन लाल पर बिना किसी स्पष्टीकरण के एकतरफा और मनगढ़ंत प्रतिवेदन के आधार पर कार्रवाई की गई है, जिसकी भासा नालंदा इकाई कड़ी निंदा करती है। डॉ. रंजन ने स्पष्ट किया कि इस एकतरफा फैसले को वापस लेने और डॉक्टरों के पुनर्पदस्थापन के लिए स्वास्थ्य विभाग को 72 घंटे का अल्टीमेटम दिया गया था, जिसकी समय-सीमा 21 सितंबर की शाम 5:00 बजे ही समाप्त हो चुकी है। विभाग की ओर से कोई ठोस कदम न उठाए जाने के कारण डॉक्टरों को विवश होकर हड़ताल का रास्ता चुनना पड़ा। इमरजेंसी, प्रसव और पोस्टमार्टम सेवाएं भी बंद करने की चेतावनी इधर, भासा संघ ने स्वास्थ्य विभाग को कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए आंदोलन को और तेज करने का ऐलान किया है। संघ ने साफ किया है कि यदि दंडात्मक आदेश तत्काल निरस्त नहीं किया गया, तो आंदोलन को नालंदा से लेकर सहरसा जिले तक उग्र रूप दिया जाएगा। इसके तहत सभी सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में पूर्ण बंदी की जाएगी, जिससे आपातकालीन सेवा, प्रसव कार्य और पोस्टमार्टम जैसी अनिवार्य सेवाएं भी पूरी तरह बाधित हो जाएंगी। संघ ने दो-टूक कहा है कि इस गतिरोध के चलते यदि जिले में किसी प्रकार की चिकित्सीय अव्यवस्था फैलती है या किसी मरीज की जान जाती है, तो उसकी पूरी जवाबदेही स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन की होगी। बंद काउंटरों के बाहर दर्द से कराहते रहे मरीज अस्पताल परिसर में हड़ताल का असर साफ नजर आया, जहां ग्रामीण इलाकों से पहुंचे असहाय मरीज इलाज के अभाव में भटकते रहे। हिलसा निवासी मुसाफिर प्रसाद ने बताया कि रात में ही हड्डी रोग विशेषज्ञ को दिखाने पहुंचे थे, लेकिन उन्हें अगले दिन आने को कहा गया। जब वे सुबह पहुंचे तो डॉक्टरों के हड़ताल पर जाने की बात कहकर लौटा दिया गया। जोहिया पसोड़ा से आए राम विनय गिरी ने बताया कि उन्हें हर्निया की समस्या है और पेट का अल्ट्रासाउंड कराना था, लेकिन अस्पताल का पर्ची काउंटर बंद होने की वजह से वे परेशान घूम रहे हैं। तोहिया गांव निवासी बीरन कुमार टूटे पैर के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे थे, लेकिन डॉक्टरों के कार्य बहिष्कार के कारण उन्हें कोई प्राथमिक उपचार तक नहीं मिला। वहीं, पेट दर्द से कराह रहे बिहार शरीफ निवासी अभिषेक कुमार और महेश्वर दास ने बताया कि वे तेज दर्द के कारण करवट तक नहीं ले पा रहे हैं, लेकिन रजिस्ट्रेशन काउंटर बंद होने और डॉक्टरों के बहिष्कार की वजह से कोई देखने वाला नहीं है। ओपीडी ठप होने से मरीजों में भारी आक्रोश है और जल्द समाधान न निकलने पर स्वास्थ्य संकट और गहराने की आशंका है।
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