![]()
रंगों का त्योहार होली पूरे देश में अपनी विविधता के लिए जाना जाता है, लेकिन बेगूसराय के मटिहानी गांव में आयोजित होने वाला ऐतिहासिक होली महोत्सव अपनी एक अलग ही पहचान रखता है। कहते हैं कि होली खेलनी हो तो मथुरा-वृंदावन जाओ, लेकिन मटिहानी की महिलाओं ने इस बार जो नजारा पेश किया, उससे गलियां गुलाल नहीं, बल्कि महिलाओं के जोश से लाल-पीली हो गई। यहां रंगों का खेल सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि दो टीमों के बीच एक फ्रेंडली वॉर बन गया। परंपरा और आधुनिकता के संगम के बीच आयोजित इस उत्सव में महिलाओं ने न केवल एक-दूसरे पर रंगों की बौछार की, बल्कि राधा-कृष्ण का रूप धरकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए समां बांध दिया। महिलाओं ने होली के ऐसे रंग बिखेरे कि पूरा गांव सतरंगी हो उठा। महोत्सव का मुख्य आकर्षण महिलाओं के बीच होने वाला रंगों का खेल रहा। इसके लिए महिलाओं की दो विशेष टीमें बनाई गई थी। इन टीमों ने गांव के चिन्हित किए गए प्राचीन कुओं पर जाकर एक-दूसरे को रंगों और गुलाल से सराबोर कर दिया। बड़ी संख्या में महिलाएं हाथ में रंग, गुलाल और पिचकारी लेकर टोलियों में निकली। जैसे ही एक टीम दूसरी टीम के सामने आती, होली के गीतों और हंसी-ठिठोली के बीच रंगों की बरसात शुरू हो जाती। गीतों ने माहौल को पूरी तरह से उत्सवमयी बनाया मटिहानी की गलियों में उड़ते गुलाल और गूंजते फाग के गीतों ने माहौल को पूरी तरह से उत्सवमयी बना दिया। इस होली महोत्सव में भक्ति और संस्कृति का भी अनूठा संगम देखने को मिला। गांव की महिलाओं और युवतियों ने भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी का मनमोहक वेश धारण किया। सजे-धजे मंच पर जब इन कान्हा और राधा ने ब्रज की होली के तर्ज पर नृत्य पेश किया, तो वहां मौजूद हर शख्स मंत्रमुग्ध हो गया। सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक होली गीतों, चैता और डोरी जैसे लोक संगीत पर महिलाओं ने जमकर ठुमके लगाए। राधा-कृष्ण की इस झांकी ने दर्शकों को ऐसा एहसास कराया मानो मथुरा-वृंदावन की होली साक्षात मटिहानी की धरती पर उतर आई हो। ग्रामीणों के अनुसार मटिहानी की यह होली महोत्सव दशकों पुराना है। यहां की विशेषता यह है कि इसमें गांव का हर वर्ग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है। गांव में सुरक्षा के भी कड़े इंतजाम किए महिलाओं की भागीदारी इस महोत्सव को और भी खास बनाती है। महोत्सव का उद्देश्य अपनी लोक परंपराओं को आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाना और आपसी भाईचारे को मजबूत करना है। महोत्सव को लेकर गांव में सुरक्षा के भी कड़े इंतजाम किए गए थे। स्थानीय लोगों की टोली अनुशासन बनाए रखने में सक्रिय रही। उत्सव के दौरान पूरे कार्यक्रम की निगरानी की जा रही थी, जिससे व्यवस्था बनी रहे। महिलाओं के इस उत्साह और ऊर्जा ने यह साबित कर दिया कि मटिहानी की होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि सशक्तिकरण और सामूहिक खुशी का प्रतीक है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह महोत्सव सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि गांव की एकजुटता का प्रतीक है। कुओं पर जाकर होली खेलने की यह परंपरा पुरखों के जमाने से चली आ रही है, जिसे आज की पीढ़ी की महिलाएं और भी भव्य तरीके से आगे बढ़ा रही हैं।
Source link