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एमजीसीयू में दिव्यांगजनों के भविष्य अधिकार और समावेशी विकास को लेकर गंभीर मंथन




सिटी रिपोर्टर| मोतिहारी एमजीसीयू में दिव्यांगजनों के भविष्य, अधिकार और समावेशी विकास को लेकर गंभीर मंथन की शुरुआत हुई। विश्वविद्यालय के सेल फॉर पर्सन्स विद डिसएबिलिटी के तत्वावधान में भारत में दिव्यांगों का भविष्य विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ बुधवार को विश्वविद्यालय परिसर में किया गया। यह सम्मेलन समावेशी शिक्षा, गरिमा केंद्रित विकास और दिव्यांगजनों की सामाजिक सहभागिता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। अध्यक्षीय संबोधन में एमजीसीयू के कुलपति प्रो संजय श्रीवास्तव ने कहा कि विश्वविद्यालय समावेशन को अपनी अकादमिक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा मानता है। उन्होंने बताया कि पीडब्ल्यूडी सेल के माध्यम से दिव्यांगजनों के हित में निरंतर सकारात्मक और व्यावहारिक प्रयास किए जा रहे हैं। दिव्यांग विद्यार्थियों की शैक्षणिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी को और अधिक दिव्यांग-अनुकूल बनाया जाएगा, ताकि सभी को समान अवसर मिल सके। उद्घाटन सत्र में मुख्य प्रॉक्टर प्रो प्रसून दत्त ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को उसकी शारीरिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसके आत्मिक गुणों और क्षमताओं से आंका जाना चाहिए। उन्होंने भारतीय दर्शन और परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारी संस्कृति में दिव्यांगता को कमजोरी नहीं, बल्कि विशिष्ट सामर्थ्य के रूप में देखा गया है। दिव्यांग सहारा और दिव्यांग अमर जैसी अवधारणाएं इसी सोच को दर्शाती हैं। सम्मेलन की पृष्ठभूमि और उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए सेल फॉर पर्सन्स विद डिसएबिलिटी के सदस्य सचिव डॉ दीपक ने कहा कि यह सम्मेलन समावेशन की व्यापक अवधारणा को केंद्र में रखता है। उन्होंने कहा कि किसी न किसी रूप में हर व्यक्ति समाज में हाशिए पर होता है। इस सम्मेलन का उद्देश्य सभी वंचित और सीमांत समूहों को एक साझा मंच प्रदान कर संवाद, सहयोग और समाधान की दिशा में ठोस पहल करना है। उन्होंने कहा कि समावेशन लोकतंत्र, मानवाधिकार और सामाजिक न्याय की बुनियाद है और तकनीक को भी अधिक समावेशी बनाना समय की मांग है। विकास तभी सार्थक है जब वह गरिमा-केंद्रित हो। मुख्य अतिथि प्रो डीसी राय, कुलपति, बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय ने कहा कि समावेशन केवल नीति या योजना तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह मानवीय संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी का विषय है। उन्होंने कहा कि समावेशन ही लोकतंत्र की आत्मा है और मानवाधिकारों की सच्ची अभिव्यक्ति भी। कार्यक्रम का संचालन डॉ. कल्याणी हजारी ने किया, जबकि डॉ. पाथलोथ ओंकार ने धन्यवाद ज्ञापन किया। यह सम्मेलन एक समावेशी, न्यायपूर्ण और गरिमामयी समाज के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देगा।



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